पोलावरम परियोजना के तकनीकी अध्ययन से जुड़े केंद्र पहुंची बस्तर की टीम, समझी बांध निर्माण और जल प्रबंधन की तकनीक

पुणे- बस्तर के पत्रकारों के मीडिया दौरे के दूसरे दिन की शुरुआत केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र (Central Water and Power Research Station-CWPRS) के दौरे से हुई। यहां विशेषज्ञों ने बांध निर्माण, पानी के बहाव, नदी और जलाशयों के अध्ययन तथा जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों की विस्तार से जानकारी दी। दौरे के दौरान टीम को बताया गया कि किसी बड़े बांध या जल परियोजना के निर्माण से पहले नदी में पानी के बहाव, जलस्तर, नदी की संरचना और अलग-अलग परिस्थितियों में पानी के संभावित प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। छोटे स्तर पर तैयार किए गए भौतिक मॉडलों के माध्यम से यह देखा जाता है कि बांध बनने के बाद पानी किस दिशा में और किस तरह बह सकता है। इससे बांध और उससे जुड़ी संरचनाओं के डिजाइन को बेहतर बनाने तथा बाढ़ जैसी परिस्थितियों में पानी के संभावित प्रभावों को समझने में मदद मिलती है।

 

 

 

 

 

पोलावरम परियोजना के तकनीकी अध्ययन पर विशेष जानकारी

दक्षिण बस्तर के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली पोलावरम परियोजना को लेकर भी टीम ने केंद्र के विशेषज्ञों से जानकारी ली। पोलावरम सिंचाई परियोजना आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर निर्मित की जा रही एक राष्ट्रीय परियोजना है। परियोजना में सिंचाई के साथ अन्य जल उपयोगों और जलविद्युत उत्पादन से जुड़े प्रावधान भी हैं। भारत सरकार के अनुसार परियोजना से 2.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है. पोलावरम परियोजना के तकनीकी अध्ययन में केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सीडब्ल्यूपीआरएस ने परियोजना के स्पिलवे, पानी की तेज गति को नियंत्रित करने वाली संरचना, पानी के आने-जाने वाले मार्गों और गाइड बंड के डिजाइन को बेहतर बनाने के लिए भौतिक और कंप्यूटर आधारित मॉडल अध्ययन किए हैं। संस्थान के अनुसार इन अध्ययनों का उद्देश्य स्पिलवे और उसके आगे के हिस्सों में पानी के बहाव को बेहतर समझना और संरचनाओं के डिजाइन को अधिक प्रभावी बनाना था। केंद्र में टीम को पोलावरम परियोजना के 1:140 स्केल के त्रि-आयामी भौतिक मॉडल के बारे में भी जानकारी दी गई। इस मॉडल के माध्यम से वास्तविक परियोजना में पानी के बहाव की परिस्थितियों को छोटे स्तर पर समझने और विभिन्न व्यवस्थाओं का परीक्षण करने में मदद मिलती है। सीडब्ल्यूपीआरएस ने स्पिलवे और पावर इंटेक से जुड़े अध्ययन भी किए हैं।

पानी के तेज बहाव को नियंत्रित करने की प्रक्रिया समझी

विशेषज्ञों ने बताया कि बड़े बांधों में पानी को नियंत्रित तरीके से नीचे की ओर छोड़ना बहुत महत्वपूर्ण होता है। स्पिलवे और उससे जुड़ी संरचनाओं की मदद से अतिरिक्त पानी को सुरक्षित तरीके से आगे पहुंचाया जाता है। मॉडल अध्ययन के माध्यम से यह जांचा जाता है कि तेज बहाव की स्थिति में पानी किस तरह आगे बढ़ेगा और बांध की संरचनाओं तथा नीचे के क्षेत्रों पर उसका क्या प्रभाव पड़ सकता है। पोलावरम परियोजना के मामले में सीडब्ल्यूपीआरएस द्वारा किए गए अध्ययनों में स्पिलवे के साथ-साथ पानी के पहुंचने और निकलने वाले मार्गों तथा गाइड बंड की व्यवस्था का भी अध्ययन किया गया है। इन अध्ययनों का उद्देश्य पानी के बहाव को बेहतर तरीके से समझना और परियोजना की विभिन्न संरचनाओं के सुरक्षित एवं प्रभावी संचालन में सहायता करना है।

कोंटा क्षेत्र से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय

पोलावरम परियोजना बस्तर के पत्रकारों के लिए इसलिए भी विशेष महत्व रखती है, क्योंकि परियोजना के प्रभावों को लेकर छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोंटा क्षेत्र में लंबे समय से चर्चा होती रही है। टीम ने विशेषज्ञों से परियोजना के तकनीकी पहलुओं, पानी के प्रवाह और बड़ी नदी परियोजनाओं के संभावित प्रभावों के अध्ययन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त की। विशेषज्ञों ने बताया कि बड़ी नदी परियोजनाओं में केवल बांध का निर्माण ही महत्वपूर्ण नहीं होता। बांध से पानी छोड़े जाने के बाद उसका प्रवाह किस दिशा में जाएगा, जलस्तर में किस तरह बदलाव हो सकता है और नीचे के क्षेत्रों पर उसका क्या प्रभाव पड़ सकता है, इन सभी पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

नहरों के जरिए खेतों तक पहुंचाया जाता है पानी

दौरे के दौरान यह भी समझाया गया कि बड़ी जल परियोजनाओं में बांध में संग्रहित पानी को नियंत्रित कर नहरों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है। सिंचाई के लिए पानी के वितरण से लेकर जलविद्युत उत्पादन तक की प्रक्रिया को मॉडल और तकनीकी प्रस्तुतियों के माध्यम से समझाया गया। भारत सरकार के अनुसार पोलावरम सिंचाई परियोजना का उद्देश्य 2.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित करना है। परियोजना को आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था।

मॉडल के जरिए समझी बांध की कार्यप्रणाली

केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र में टीम को विभिन्न जल संरचनाओं के मॉडल भी दिखाए गए। विशेषज्ञों ने बताया कि वास्तविक परियोजना में निर्माण से पहले मॉडल पर पानी के बहाव की अलग-अलग परिस्थितियों को परखा जा सकता है। इससे डिजाइन में आवश्यक सुधार करने, पानी के बहाव को बेहतर समझने और परियोजना की संरचनाओं को अधिक सुरक्षित बनाने में सहायता मिलती है।

बस्तर की टीम के लिए यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि पोलावरम जैसी बड़ी नदी परियोजना का संबंध दक्षिण बस्तर के कोंटा क्षेत्र और वहां रहने वाले लोगों से जुड़े मुद्दों से भी है। पत्रकारों ने जल परियोजनाओं के वैज्ञानिक और तकनीकी पक्ष को समझने के साथ-साथ परियोजना के संभावित प्रभावों को तकनीकी दृष्टिकोण से जानने का प्रयास किया। सीडब्ल्यूपीआरएस के विशेषज्ञों ने बताया कि बड़े बांध और जल परियोजनाओं के लिए वैज्ञानिक अध्ययन का उद्देश्य केवल निर्माण को तकनीकी रूप से बेहतर बनाना नहीं है, बल्कि बाढ़ के दौरान पानी के व्यवहार, संरचनाओं की सुरक्षा और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग को समझना भी है। इस दौरे से बस्तर के पत्रकारों को देश की बड़ी जल परियोजनाओं के पीछे होने वाले वैज्ञानिक अध्ययनों और जल प्रबंधन की प्रक्रिया को करीब से समझने का अवसर मिला।

 

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