बस्तर- झीरम घाटी हमले के मामले में NIA की विशेष अदालत के फैसले के बाद अब कोर्ट की ऑर्डरशीट ने उस पूरी कड़ी को सामने रखा है. जिसके मुताबिक हमले की तैयारी घटना से काफी पहले शुरू हो चुकी थी. किस स्तर पर बैठक हुई. किसे क्या जिम्मेदारी दी गई. एंबुश के लिए जगह कैसे तय हुई. रसद कौन जुटा रहा था और घटना के दिन किन लोगों की क्या भूमिका रही. ऑर्डरशीट में इन सभी पहलुओं का उल्लेख किया गया है.
कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक 25 फरवरी 2013 को साउथ रीजनल यूनिफाइड कमांड की बैठक हुई थी. इसी दौरान TCOC के बीच दरभा डिवीजन में बड़ी कार्रवाई करने का प्रस्ताव सामने आया. रिकॉर्ड के अनुसार बारसे देवा और सुरेंद्र ने बड़ी घटना को अंजाम देने की योजना बैठक में रखी. इसके बाद झीरम ऑपरेशन की कमान इन्हीं दोनों को सौंपे जाने का उल्लेख आदेश में है. इसके बाद नक्सली संगठन के भीतर अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां बांटी गईं. देवजी और गणेश उइके ने नक्सली कमांडर जयलाल को CRC कंपनी-2 की टुकड़ी के साथ दरभा डिवीजन भेजा. वहीं एंबुश के लिए उपयुक्त जगह तलाशने और तय करने की जिम्मेदारी बारसे देवा और सुरेंद्र को दी गई. श्याम और सुरेंद्र को ऑपरेशन के लिए जरूरी सामान जुटाने की जिम्मेदारी दिए जाने की बात भी रिकॉर्ड में सामने आती है. ऑर्डरशीट में इस कार्रवाई को नक्सली संगठन के शीर्ष नेताओं गणपति और रमन्ना की मंजूरी मिलने का भी उल्लेख है.
यह कोई छोटी कार्रवाई नहीं थी. कोर्ट के रिकॉर्ड में घटना में 150 से ज्यादा नक्सलियों की मौजूदगी का उल्लेख है. सुरेंद्र, बारसे देवा, जयलाल, विनोद और सोनाधार जैसे प्रमुख नक्सली कमांडरों के साथ अलग-अलग टुकड़ियों के नक्सलियों को इस ऑपरेशन में लगाया गया था.
हमले से पहले सिर्फ बैठक नहीं, जंगल में अभ्यास भी
झीरम ऑपरेशन की तैयारी का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा था पूर्व अभ्यास. ऑर्डरशीट के अनुसार मिलिट्री कंपनी-2 की बैठक हुई थी. जिसमें प्रमिला और चैतू लेकाम के शामिल होने का उल्लेख है. इसके बाद चिकपाल के पास जंगल में घटना से पहले अभ्यास भी किए जाने की बात रिकॉर्ड में दर्ज है. यानी कोर्ट के सामने रखे गए साक्ष्यों के मुताबिक हमला अचानक हुई कार्रवाई नहीं था. बल्कि इसके लिए पहले से तैयारी और अभ्यास किया गया था. ऑर्डरशीट में घटना के दिन मौजूद रहे अभियुक्तों के तौर पर प्रमिला, बंजामी सन्ना, आयता मड़काम, मुक्का माड़वी, मड़कामी देवा, चैतू लेकाम, कवासी कोसा, महादेव नाग, जोगा मड़कामी, सुमित्रा और कोसाराम समेत नामों का उल्लेख मिलता है. इनमें कवासी कोसा की मृत्यु हो चुकी है. रिकॉर्ड के मुताबिक प्रमिला, बंजामी सन्ना और महादेव नाग पर हमले के बाद जवानों के हथियार लूटने की भूमिका का उल्लेख किया गया है. मामले में चैतू लेकाम के बयान का भी उल्लेख है. उसके बयान के मुताबिक हमले के दिन उसने और प्रमिला ने काफिले पर फायरिंग की थी. चैतू ने अपनी इंसास राइफल से 10 राउंड गोली चलाने की बात कही. जबकि प्रमिला के भी राइफल से फायरिंग करने का जिक्र उसके बयान में है. इसके अलावा अन्य आरोपियों के बारे में घटना से पहले बैठकों में शामिल होने, राशन-सामान पहुंचाने और घटना के बाद हथियार लूटने जैसी भूमिकाओं का उल्लेख रिकॉर्ड में किया गया है.
झीरम से पहले भी दर्ज थे अपराध
ऑर्डरशीट में यह भी सामने आता है कि कुछ आरोपियों का नक्सली संगठन से जुड़ाव झीरम घटना से पहले का बताया गया था. दरभा थाने में मुक्का माड़वी, आयता मड़काम और कवासी कोसा के खिलाफ झीरम घटना से पहले दर्ज अपराधों की जानकारी जांच में शामिल किए जाने का उल्लेख है. घटना के दौरान नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल समेत अन्य लोगों को नक्सलियों द्वारा घेरने और कुछ लोगों को सरेंडर करने के लिए कहे जाने का भी रिकॉर्ड में उल्लेख है. इसी दौरान नक्सली कमांडर विनोद द्वारा कवासी लखमा से गोंडी में बातचीत किए जाने की बात सामने आती है. इसके बाद नंदकुमार पटेल और दिनेश पटेल को हाथ बांधकर बंधक बनाया गया. जबकि कवासी लखमा, दसाराम और अन्य लोगों को छोड़ दिया गया.
हमले के बाद 22 हथियार लूटे गए
ऑर्डरशीट के मुताबिक हमले के बाद नक्सलियों ने 9 AK-47, 7 इंसास राइफल, 4 MM पिस्टल और 2 SLR समेत कुल 22 हथियार लूटे. यह हिस्सा इसलिए भी अहम है क्योंकि रिकॉर्ड में हमले की तैयारी और घटना के बाद की कार्रवाई दोनों को एक ही आपराधिक घटनाक्रम की कड़ी के रूप में देखा गया है. इस मामले की जांच के दौरान NIA ने कुल 101 गवाहों के बयान दर्ज किए. इनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल थे. जो पहले नक्सली संगठन से जुड़े रहे थे. ऑर्डरशीट के अनुसार इन गवाहों के बयानों में आरोपियों के घटना से पहले नक्सली संगठन में सक्रिय रहने की बात सामने आई. अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के सामने 207 दस्तावेजी साक्ष्य भी पेश किए.
अदालत में आरोपियों ने खुद को निर्दोष बताया और झूठे तरीके से फंसाए जाने की बात कही. हालांकि आदेश में दर्ज विवरण के अनुसार बचाव पक्ष इन दावों के समर्थन में ऐसा साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे अभियोजन की कहानी का खंडन हो सके.
मामले में कुल 39 आरोपियों का उल्लेख है. इनमें 11 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल चला. बाकी आरोपियों के संबंध में अलग- अलग स्थिति सामने आई. कुछ मुख्यधारा में लौटे, कुछ मुठभेड़ों में मारे गए और कुछ अब भी फरार बताए गए हैं. फरार आरोपियों के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया का फैसला अभी बाकी बताया गया है.
NIA विशेष अदालत ने दोषी ठहराए गए 10 आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है. अदालत के आदेश में फांसी की सजा का उल्लेख करते हुए कहा गया कि दोषियों को गर्दन में फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए. जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए. सभी सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश भी दिया गया है. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया अभी बाकी है. मृत्युदंड को हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही लागू किया जा सकता है. बचाव पक्ष को फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार भी दिया गया है. मामले का रिकॉर्ड पुष्टि के लिए हाईकोर्ट भेजा जाएगा. जेल रिपोर्ट में भी दर्ज हुई आरोपियों की स्थिति. जगदलपुर केंद्रीय जेल अधीक्षक की रिपोर्ट में आरोपियों के शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने की जानकारी कोर्ट के सामने रखी गई. रिपोर्ट में उनके निवास और कृषि भूमि से जुड़ी जानकारी का भी उल्लेख किया गया. झीरम की कहानी में ऑर्डरशीट का सबसे बड़ा संकेत पूरे आदेश को देखा जाए तो झीरम हमला एक ऐसी कार्रवाई के तौर पर सामने आता है. जिसकी तैयारी में बैठक, रणनीति, कमांडरों की तैनाती, एंबुश की जगह का चयन, रसद जुटाना, जंगल में अभ्यास और अलग-अलग टुकड़ियों की भूमिका जैसे कई चरण शामिल थे. अब 10 दोषियों को सुनाई गई मौत की सजा के बाद इस मामले की अगली बड़ी कानूनी कड़ी हाईकोर्ट में मृत्युदंड की पुष्टि और बाकी आरोपियों से जुड़ी प्रक्रिया होगी.