बारिश के मौसम में वैज्ञानिक प्रबंधन से सुरक्षित रहेगी पशुधन और पशुपालकों की आजीविका

जगदलपुर. बारिश का मौसम पशुपालकों के लिए राहत के साथ-साथ कई गंभीर चुनौतियां भी लेकर आता है. इस ऋतु में नमी बढ़ने, पशु आवास में पानी व कीचड़ जमा होने, चारे की गुणवत्ता प्रभावित होने और संक्रामक रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ने की संभावना रहती है. बस्तर जैसे ग्रामीण एवं आदिवासी अंचल में पशुपालन आजीविका का प्रमुख आधार है, इसलिए इस दौरान मवेशियों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन बेहद जरूरी हो जाता है. शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कुम्हरावंड की सहायक प्राध्यापक डॉ. नीता मिश्रा ने उन्नत गौशाला में आयोजित वैज्ञानिक पशुपालन शिविर के दौरान विद्यार्थियों और पशुपालकों को वर्षा ऋतु में पशुधन सुरक्षा के महत्वपूर्ण गुर सिखाए.

​पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए पशुशाला का फर्श ऊंचा और पर्याप्त ढलान वाला होना चाहिए ताकि पानी व मलमूत्र की निकासी आसानी से हो सके. गीली जगह और कीचड़ के कारण खुर रोग तथा त्वचा संक्रमण तेजी से फैलते हैं, जिनसे बचाव के लिए नियमित सफाई, सूखा बिछावन और पर्याप्त वेंटिलेशन जरूरी है. बारिश में गलघोटू, लंगड़ा बुखार, खुरपका-मुंहपका, एंथ्रेक्स, पीपीआर, स्वाइन फीवर और रानीखेत जैसी जानलेवा संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, जिनसे बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम समय पर टीकाकरण है. पशुपालकों को सरकारी अभियानों में भाग लेकर अनिवार्य रूप से मवेशियों का टीकाकरण कराना चाहिए.

​पशुओं को फफूंद लगा या सड़ा-गला चारा बिल्कुल न दें और केवल हरे चारे पर निर्भर रहने के बजाय सूखा चारा, दाना मिश्रण, खनिज लवण व नमक का संतुलित आहार दें. थनैला रोग से बचाव के लिए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराएं और दुग्ध दोहन के समय थनों व बर्तनों की विशेष स्वच्छता रखें. नवजात बछड़ों और मेमनों को ठंड व नमी से बचाते हुए जन्म के तुरंत बाद खीस पिलाएं. तेज बारिश या आकाशीय बिजली के समय मवेशियों को खुले में न छोड़ें तथा सुस्ती, तेज बुखार, लंगड़ापन या दूध में अचानक कमी जैसे लक्षण दिखते ही बीमार पशु को तुरंत अलग कर पशु चिकित्सक से परामर्श लें.

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