शिक्षक दिवस 2026: बाढ़ में टूटा पुल, लेकिन नहीं टूटी शिक्षकों की हिम्मत, बस्तर में नदी पार कर बच्चों का भविष्य गढ़ने पहुंचते हैं स्कूल….

बस्तर- एक तरफ लगातार बारिश से नदी-नाले बस्तर में उफान पर हैं. दूसरी तरफ बाढ़ के कहर से सड़क पुल टूट चुका है. रास्ता बंद है लेकिन बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए. इसी जज्बे के साथ शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर हर दिन नदी पार करते हैं. और स्कूल पहुंचते हैं. ये तस्वीरें किसी फिल्म की नहीं, बल्कि बस्तर की हकीकत है. जहां शिक्षक के सामने स्कूल पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. बीते 1 साल से यही मुश्किलें उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनी हुई है. शिक्षक दिवस के मौके पर देखिए उन शिक्षकों की कहानी जो सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं पढ़ा रहे हैं. बल्कि मुश्किल हालातों के बीच बच्चों के भविष्य की नींव रख रहे हैं.

प्रतिदिन सुबह ये सभी शिक्षक मोटरसाइकिल से घर से निकलते हैं. और उफनती नदी के किनारे पहुंचते हैं. फिर अपनी गाड़ी नदी के किनारे खड़े करके बहती नदी को पार करते हैं. जलस्तर बढ़ने से शिक्षकों की मुश्किलें काफी बढ़ जाती है. एक दूसरे का हाँथ थामकर वे आगे बढ़ते है. नदी पार करने के बाद करीब 3 किलोमीटर तक पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं. और बच्चों को शिक्षा देते है. दरअसल 26 अगस्त 2025 को में आई बाढ़ ने बस्तर जिले में तबाही मचाई थी. सबसे अधिक प्रभावित लोहंडीगुड़ा, तोकापाल, दरभा और बास्तानार ब्लॉक प्रभावित हुआ था. गांव डूब गए. कई सड़के पुल टूट गई. लोगों की जान भी बाढ़ ने ली. पूरे बस्तर ने तबाही के मंजर को देखा था. घटना के 1 साल बीतने पर भी तबाही का मंजर आंखों के सामने खड़ा है. आपदा को ठीक करने में सरकार व प्रशासन पूरी तरह फेल और नाकाम है. क्योंकि कई इलाकों में ग्रामीणों ने खुद से श्रमदान करके अपने लिए सड़कों का पुनः निर्माण किया है. और जगह जगह वैकल्पिक व्यवस्था भी किया गया है.

स्कूल बस्तर जिले के बास्तानार विकासखंड के लालागुड़ा में मौजूद हैं. ब्लॉक मुख्यालय बास्तानार से इसकी दूरी करीब 10 किलोमीटर है. वहीं जिला मुख्यालय जगदलपुर से 50-55 किलोमीटर दूर है. इस गांव में प्राथमिक शाला और हाई स्कूल संचालित है. जहां के शिक्षक हर दिन नदी पार करके स्कूल पहुंचते हैं. इस गांव में प्राथमिक शाला, माध्यमिक शाला और हाई स्कूल में करीब 90 छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण करते है. इनमें से कुछ छात्र भी नदी पार करके स्कूल पहुंचते हैं.

शिक्षक सन्नी डेविड नाग ने बताया कि पैदल नदी पार कर स्कूल जाने का सिलसिला पिछले 1 साल से जारी है. बाढ़ के कहर से सड़क और पूल का हिस्सा टूट गया है. काफी तकलीफें होती है. ग्रामीणों के बनाये वैकल्पिक व्यवस्था को भी बाढ़ बहा ले गया. इसीलिए पैदल नदी को पार करते हैं. और करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं. बाढ़ से पहले स्कूल तक सीधे गाड़ी से पहुंचते थे. लेकिन बाढ़ ने मुश्किलें बढ़ा दी है. जल स्तर कम होने से मोटरसाइकिल को पार किया जाता है. लेकिन गाड़ी फंस जाती है. ऐसे में मुश्किलें और बढ़ती है. एक दो साथी रहने से मशक्कत करनी पड़ती है. तब जाकर फसी गाड़ी बाहर निकलती है. शिक्षक ने कहा कि बच्चे बस्तर के भविष्य हैं. उनकी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए. बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं देने से और हर दिन का क्लास नहीं लेने से वह पिछड़ जाएंगे. इसीलिए यही सोच होती है कि कैसे भी स्कूल पहुंचे और बच्चों को पढ़ाएं. बच्चों को नैतिक शिक्षा, पुस्तकीय शिक्षा, बाहरी शिक्षा दें. क्योंकि बस्तर के बच्चों को आगे बढ़ाना काफी जरूरी है. बस्तर पिछड़ा इलाका है. विकास से दूर है इसीलिए बच्चे शिक्षा, खेलकुद में आगे बढ़ेंगे तो भविष्य अच्छा होगा.

शिक्षक संजय बारीक ने बताया कि हमारा कर्तव्य यही है कि वो बच्चों को पढ़ाएं और उनकी वजह से पढ़ाई न रुकें. क्योंकि बच्चे देश के भविष्य हैं. पूल टूटने के कारण काफी परेशानी होती है. कई बच्चे नदी पार करके हायर सेकंडरी स्कूल पहुंचते हैं. शासकीय योजनाओं को पहुंचाने में दिक्कत होती है. स्वास्थ्य सेवाओं की समस्या होती है. बीते सप्ताह एक एम्बुलेंस रास्ते में फंस गई थी. जिसे बाद में गांव के लोगो ने मिलकर ट्रैक्टर की सहायता से बाहर निकाला. महिलाएं छोटे बच्चे लेकर नदी पार करते हैं. इस तरह काफी परेशानी हो रही है. चेहरे पर मुस्कान बनी हुई है. क्योंकि अब इस तरह नदी पार करके स्कूल जान एक आदत बन गई है. क्योंकि घर से निकलने समय यह उम्मीद रहती है कि बच्चे स्कूल पहुंचकर शिक्षकों का इंतज़ार कर रहे हैं. बच्चे जब स्कूल आते हैं तो उन्हें भी मोटिवेशन मिलता है. इसीलिए स्कूल आना ही है. जल स्तर बहुत अधिक बढ़ने से घूम कर स्कूल जाना पड़ता है. या फिर मजबूरी में CL लेना पड़ता है. बच्चों की पढ़ाई हमारे कारण प्रभावित नहीं होना चाहिए.

शिक्षिका चंदना कांगे का कहना है कि पढ़ाई काफी जरूरी है. शिक्षा है तो सबकुछ है. शिक्षा से बच्चे सबकुछ सीखतें हैं. शिक्षा के साथ बदलाव और परिवर्तन आता है. शिक्षा के बगैर इंसान की तुलना जानवरों से की जाती है. शिक्षा तरक्की लाती और जीने का रहन सहन भी बदलती है. पिछले 25-26 अगस्त 2026 को आये बाढ़ से ही पूल और सड़के टूटी है. बास्तानार ब्लॉक के अंदरूनी इलाकों का यही नजारा है. सड़के और पूल टूट चुकी है. इस रास्ते में कोई घटना तो नहीं हुई. लेकिन आने जाने में काफी दिक्कतें होती है. यहाँ तक तो गाड़ी में आ जाते हैं. लेकिन आगे का सफर काफी मुश्किल भरा होता है. क्योंकि समय पर स्कूल पहुंचना और स्कूल में ऑनलाइन कार्यों को करना होता है. क्योंकि नदी पार करने में करीब 500 मीटर और आगे करीब 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. बारिश के कारण अचानक जलस्तर बढ़ गया था. कमर तक पानी आ गया था. अधिक बहाव होने से छुट्टी लेना पड़ता है. कई बार एक दूसरे का हाँथ पकड़कर आगे पार करना पड़ता है.

टूटे पूल और सड़क ने इस इलाके में मुश्किलें काफी बढ़ा दी है. नदी पार करना रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है. लेकिन शिक्षकों ने इस मुश्किल को अपना जुनून बना लिया है. और नदी पार कर शिक्षा की अलख जगाई जा रही है. शिक्षक दिवस के अवसर पर मुश्किल हालातों से जूझते शिक्षकों को सलाम है.

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