जगदलपुर। शहर के एक प्रमुख शासकीय आवासीय परिसर में इन दिनों हड़कंप मचा हुआ है, जहाँ कॉलोनी के जीर्णोद्धार और मरम्मत के नाम पर वहां रह रहे शासकीय कर्मचारियों को अचानक आवास खाली करने का नोटिस थमा दिया गया है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में अपनाई जा रही कार्यप्रणाली ने कई गंभीर कानूनी, प्रशासनिक और नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि इस कार्रवाई में ‘पिक एंड चूज’ यानी चयनित प्रताड़ना की नीति अपनाई जा रही है जिसके तहत परिसर के मूल विभाग के कर्मचारियों और अन्य विभागों में पदस्थ कर्मचारियों के बीच खुला भेदभाव किया जा रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला और हैरान करने वाला पहलू यह है कि प्रशासन दोहरे मापदंड अपना रहा है, जहाँ एक तरफ कॉलोनी के मूल विभाग से जुड़े जिन कर्मचारियों के आवासों में मरम्मत का कार्य होना है उन्हें प्रशासन द्वारा बाकायदा वैकल्पिक आवास उपलब्ध करा दिया गया है ताकि उन्हें कोई असुविधा न हो और वहीं इसी विभाग के कुछ अन्य कर्मचारियों पर मकान खाली करने का कोई खास दबाव भी नहीं बनाया जा रहा है। इसके विपरीत, जो कर्मचारी अन्य सरकारी विभागों में कार्यरत हैं और नियमतः वैध रूप से इस कॉलोनी में निवास कर रहे हैं, उन्हें ही मुख्य रूप से टारगेट किया जा रहा है और उनके ऊपर जल्द से जल्द घर खाली करने का बेतहाशा दबाव बनाया जा रहा है, जबकि उन्हें न तो कोई वैकल्पिक व्यवस्था दी गई है और न ही नया आशियाना ढूंढने का पर्याप्त समय दिया गया है।
पीड़ित कर्मचारियों ने बताया कि नोटिस मिलने के बाद उन्होंने तय समय-सीमा के भीतर अपना लिखित जवाब प्रस्तुत किया था और प्रशासनिक नियमों के तहत विभाग को उस जवाब का लिखित में ही खंडन या उत्तर देना अनिवार्य था, लेकिन इस वैधानिक प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार करते हुए आवंटन समिति के सामने पेश हुए कर्मचारियों को केवल मौखिक रूप से और नरमी का नाटक करते हुए मकान खाली करने की हिदायत दी जा रही है। जब कर्मचारियों ने नोटिस में उल्लिखित “आवास आवंटन निरस्त” किए जाने के आदेश पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा, तो अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं था और केवल मौखिक आश्वासन देकर मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी कानून की नजर में कोई वैधता नहीं है क्योंकि शासकीय कार्य केवल हस्ताक्षरों और कागजों से चलते हैं, अधिकारियों की जुबान से नहीं।
इस पूरी कार्रवाई में स्थापित प्रशासनिक और विधिक प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन होता दिख रहा है, जिसमें सबसे पहले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिलने वाले समानता के अधिकार की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं क्योंकि एक ही परिसर में रहते हुए दो विभागों के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते। इसके साथ ही यह कार्रवाई कानून के मूल ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ के भी खिलाफ है, जो कहता है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई करने से पहले उसका पक्ष सुना जाना चाहिए और कर्मचारियों के लिखित जवाब पर बिना कोई आधिकारिक आदेश पारित किए उन्हें बेदखल करना पूरी तरह गैर-कानूनी है। शासकीय आवासों को खाली कराने के लिए ‘पब्लिक प्राइमाइसेस एक्ट’ यानी लोक परिसर अधिनियम के तहत एक निश्चित कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है, जिसके तहत संपदा अधिकारी को बकायदा कोर्ट की तरह सुनवाई करनी होती है, इसलिए केवल एक प्रशासनिक नोटिस या मौखिक दबाव के बल पर किसी वैध शासकीय सेवक को जबरन बेघर नहीं किया जा सकता।
प्रशासन के इस ढुलमुल, मौखिक और भेदभावपूर्ण रवैये को देखते हुए अब प्रभावित कर्मचारियों ने भी लामबंद होना शुरू कर दिया है और वे इस पूरे मरम्मत कार्य के स्वीकृत बजट, वर्क ऑर्डर और आवंटन निरस्तीकरण के ठोस कारणों को जानने के लिए सूचना का अधिकार यानी आरटीआई लगाने की तैयारी में हैं। कर्मचारियों का साफ कहना है कि यदि इसके बाद भी विभाग ने लिखित में स्थिति स्पष्ट नहीं की और मूल विभाग की तरह उन्हें भी वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना जबरन बेदखली की कोशिश की गई, तो वे सामूहिक रूप से न्यायालय से स्थगन आदेश यानी स्टे ऑर्डर लेने का विकल्प भी खुला रख रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर विसंगति और भेदभाव को सुधार कर सभी कर्मचारियों को समान न्याय देता है या यह मामला कोर्ट की चौखट तक खिंचता है।