जगदलपुर. बस्तर की पावन धरा अपनी समृद्ध परंपराओं और ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर के साथ एक बार फिर दुनिया के सबसे लंबे चलने वाले लोक-उत्सव की साक्षी बन गई है. बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में हरेली अमावस्या के पावन अवसर पर पाट जात्रा पूजा विधान के साथ विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व का विधिवत शुभारंभ हुआ. पूरे 75 दिनों तक चलने वाले इस अनोखे और अलौकिक उत्सव की शुरुआत के साथ ही रथ निर्माण की पहली लकड़ी ठुरलू खोटला की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई.
सामान्य दशहरा पर्वों से बिल्कुल अलग, बस्तर का दशहरा रावण वध के लिए नहीं, बल्कि शक्ति स्वरूप माँ दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति अपार श्रद्धा और लोक-संस्कृति के अनूठे मेल के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता है. इस ऐतिहासिक पर्व की सबसे खास बात इसकी अद्भुत जनभागीदारी है, जिसमें सदियों पुरानी परंपराओं को निभाते हुए बस्तर संभाग के विभिन्न जनजातीय समुदायों के लोग, मांझी-चालकी, पुजारी, पटेल और नाईक-पाईक पूरी निष्ठा के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं. पाट जात्रा के बाद अब आने वाले ढाई महीनों में डेरी गड़ाई, काछनगादी, जोगी बिठाई, विशाल रथ परिक्रमा, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुड़िया दरबार जैसे कई महत्वपूर्ण पारंपरिक पूजा विधान संपन्न होंगे.
इस गरिमामय और पावन अवसर पर बस्तर दशहरा समिति के गणमान्य सदस्य, पारम्परिक मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी और बड़ी संख्या में स्थानीय सेवादार व श्रद्धालु उपस्थित रहे. पूरे अंचल में इस ऐतिहासिक उत्सव को लेकर खासा उत्साह और हर्षोल्लास का माहौल है.