बस्तर- छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक मनाये जाने वाले विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरे में विजयदशमी के दिन रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता है, बल्कि बस्तर की आराध्य दंतेश्वरी देवी के छत्र को आठ चक्कों के विशालकाय विजय रथ में सवारकर परिक्रमा करवाई जाती है. इस रस्म को 21 अक्टूबर बुधवार की देर शाम विधि विधान के साथ निभाई गई. इस रस्म को देखने के लिए हजारों की संख्या में स्थानीय लोगों के साथ ही अन्य राज्यों व विदेशों के नागरिकों की मौजूदगी रही. विजय रथ परिक्रमा ही बस्तर दशहरे में मुख्य आकर्षण का केंद्र होता है.
बस्तर राज परिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव का कहना है कि बस्तर को भारत देश में मनाया जाने वाले दशहरा पर्व से बस्तर दशहरा काफी अलग बनाती है. बस्तर में विजय दशमी के दिन भीतर रैनी की रस्म अदायगी की जाती है. इस साल विजय दशमी बस्तर दशहरे में 21 अक्टूबर को मनाया गया. इस रस्म से यह आशय है कि महाराजा आज के दिन सुबह परिवार के साथ मंदिर पहुंचकर देवी की पूजा अर्चना करते हैं. इसके बाद वे राजमहल के भीतर बैठकर बस्तरबासियों को दर्शन दिया करते हैं. क्योंकि सदियों पुरानी यह परमपरा रही है कि आम जनता महाराजा का पैर छूते हैं. आर्शीवाद लेते हैं. और नज़राना पेश करते हैं. जिसके बाद देर रात 8 चेकों के विशाल का दो मंजिला रथ में बस्तर की आराध्य देवी दंतेश्वरी के छत्र को रथारुढ़ कर शहर में परिक्रमा करवाई जाती है. इस रस्म की अदायगी के बाद देर रात रथ चोरी की रस्म निभाई जाती है. माड़िया समुदाय के लोग 8 चक्कों के विशालकाय रथ को हजारों आंखों के सामने चोरी करके लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट पहुंचाते हैं. इसके बाद अगले दिन बाहर रैनी रस्म के दौरान राजपरिवार राजशाही अंदाज में कुम्हड़ाकोट पहुंचकर माड़िया समुदाय के लोगों के साथ नयाखानी का त्यौहार मनाते हैं. जिसके बाद शान से रथ को वापस राजमहल लेकर पहुंचते हैं.
कमलचंद भंजदेव ने बताया कि राजा पुरुषोत्तम देव को जगन्नाथ पुरी से रथपति की उपाधि मिलने के बाद देवी सुभद्रा का रथ बस्तर में चलाया जाता है. इस रथ को बनाने में मशीनों का इस्तेमाल नहीं होता है. स्थानीय कारीगर अपने हांथो से तैयार करते हैं. बस्तर में रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता है. बल्कि देवी की उपासना और परिक्रमा करवाई जाती है. बस्तर दशहरा विभिन्न समुदायों का एक समागम है. अनोखी परंपराएं हैं. रस्म और रिवाज हैं. यही वजह है कि बस्तर में रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता है. और ना ही इस दशहरे का वास्ता भगवान राम से है.