बस्तर- 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा केवल आस्था, परंपरा और आदिवासी संस्कृति का महापर्व नहीं है. बल्कि इसकी जड़ों में इतिहास की ऐसी गाथाएं भी छिपी हैं, जो आज भी लोगों को साहस, स्वाभिमान और आत्मसम्मान की याद दिलाती हैं. बस्तर दशहरे में सदियों पुरानी रस्में निभाई जाती हैं. यही वजह है कि बस्तर दशहरा को करीब से देखने और इसकी अनूठी परंपराओं को समझने के लिए देश-विदेश से पर्यटक यहां पहुंचते हैं. इन्हीं परंपराओं में एक ऐसी ऐतिहासिक गाथा भी जुड़ी है, जो एक राजकुमारी के साहस उसके निर्णय और बलिदान की कहानी बयां करती है. यह कहानी है राजकुमारी चमेली बाबी की. जिनकी स्मृति आज भी बस्तर दशहरे की एक विशेष परंपरा में जीवित मानी जाती है. दशहरा पर्व के दौरान उनके नाम से ज्योति कलश स्थापित की जाती है और फूल रथ से अर्पित किया जाने वाला पुष्पगुच्छ इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है. पीढ़ियों से चली आ रही इस रस्म को आज भी एक पेगड़ परिवार के वंशज पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ निभा रहे हैं. राजकुमारी चमेली बाबी राजा हरिश्चंद्र की चौथी संतान थीं. वह अपनी सुंदरता के साथ-साथ शिक्षा, तलवारबाजी और युद्ध कौशल के लिए भी जानी जाती थीं. पिता के साथ रणभूमि में भी उन्होंने साहस और वीरता का परिचय दिया था.
बस्तर के जानकार व वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कश्यप का कहना है कि सन 1314 में वारंगल के राजा रहे अन्नमदेव बस्तर आये हुए थे. राजा को पता चला कि चित्रकोट की राजकुमारी चमेली बाबी का सुंदर है. राजकुमारी के पिता राजा हरिश्चंद्र को अन्नमदेव ने एक पत्र भेजकर उनके साथ विवाह करने का प्रस्ताव रखा. अन्यथा आक्रमण करने की चेतावनी दी थी. राजा हरिश्चंद्र ने सोचा कि शादी का प्रस्ताव अच्छी बात है. लेकिन युद्ध और आक्रमण की धमकी देने यह गलत है. चमेली बाबी को यह नागवार गुजरा. और विवाह का प्रस्ताव ठुकरा कर युद्ध को स्वीकार कर लिया. जिसके बाद लोहंडीगुड़ा के बेलियापाल के मैदान में अन्नमदेव और हरिश्चंद्र की सेना के बीच भारी युद्ध हुआ. युद्ध के दौरान देखा कि उनके पिता और सैनिकों की मौत हो गई थी. और खुद को अन्नमदेव की सेना के बीच घिरते देख चमेली बाबी और उसकी गुरु माँ झालरमति दोनों घोड़े से सैनिकों के ऊपर से उछलकर इंद्रावती नदी के किनारे खालेपारा पहुंची. जहां पहले से तैयार अग्नि में कूदकर खुद को बलिदान किया. इस घटना की जानकारी मिलने के बाद राजा अन्नमदेव को आत्मग्लानि हुआ. और राजा अन्नमदेव ने ने खालेपारा में राजकुमारी चमेली बाबी की एक समाधि बनवाई. जिसमें बैठकर अपनी वैथा को कहने लगा. इस घटना की याद में पिछले 618 सालों से चमेली बाबी की स्मृति में ज्योति कलश प्रज्वलित किया जा रहा है. बड़े डोंगर, मधोता और बस्तर में पहले राजा की राजधानी थी. जिसके बाद यह जगदलपुर में शिफ्ट हुई. 305 सालों से जगदलपुर में ज्योत प्रज्वलित किया जा रहा है.

रस्म अदायगी करने वाले गंगाराम पेगड़ बताते हैं कि इस रस्म को उनके पूर्वज निभाते आ रहे थे. पहले पूर्वज पगड़ी में फूल झोंका करते थे. फिर हर दिन घुड़सवार उसे समाधि के नजदीक प्रवाहित करते थे. आज ना राजा है, ना पगड़ी है और ना ही घुड़सवार है. इसीलिए फूल रथ रस्म के दौरान बाहें फैलाकर लाल रंग के कपड़े से फूल से झोका जाता है. जिसके बाद उसे मावली मंदिर प्रांगण में ले जाकर चमेली बाबी के नाम से जलाई गई ज्योति कलश के सामने समर्पित किया जाता है. और अष्टमी के दिन इंद्रावती नदी में प्रवाहित किया जाता है. वह इस भाव से की बहते हुए वह फूल चित्रकोट में चमेली बाबी की समाधि तक पहुंच जाए. जिसे वह स्वीकार कर लें.

बस्तर दशहरे की यही खासियत है यहां रथ केवल परिक्रमा नहीं करता, बल्कि अपने साथ सदियों की स्मृतियां, लोककथाएं और सांस्कृतिक विरासत भी आगे बढ़ाता है. राजकुमारी चमेली बाबी के नाम से जुड़ा ज्योति कलश इसी विरासत का एक ऐसा प्रतीक है, जो समय के साथ भी अपनी पहचान बनाए हुए है. इसीलिए यह दशहरा भारतदेश में अनोखा और विश्व विख्यात है.