पटवारियों की हड़ताल से बस्तर में बढ़ी किसानों की मुसीबत, गिरदावरी नहीं हुई तो धान बेचने में आ सकती है परेशानी! इंद्रावती बचाव संघर्ष समिति के किसानों ने दिया समर्थन…..

जगदलपुर- बस्तर में पटवारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. एक तरफ बाढ़ की मार झेल चुके किसान और प्रभावित परिवार राहत व मुआवजे की उम्मीद लगाए बैठे हैं. तो दूसरी तरफ पटवारियों की हड़ताल के कारण राजस्व संबंधी कामकाज प्रभावित होने की आशंका है. इसका असर आने वाले दिनों में धान खरीदी पर भी पड़ सकता है. जिन किसानों की गिरदावरी पूरी नहीं हुई है. उन्हें धान बेचने के दौरान परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.

पटवारी संघ के जिला अध्यक्ष आनंद कुमार कश्यप का कहना है कि वर्तमान में किसानों से जुड़ा सर्वे चल रहा था जिसका नाम DCS है. DCS में 95% काम पूरा किया गया. बचे हुए खसरे को PV एप्प के प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराया गया. इसकी जटिलता काफी अधिक है. खेतों के चारो कोने में जाकर फसल की दर्ज करना होता है. जिसके बाद पुनः यह DCS के लिए जाएगा. यह कार्य पूरी तरह अव्यवहारिक है. इस कार्य को नहीं करने का विरोध किया गया. नही करने पर स्थानांतरण और निलंबन की कार्रवाई झेलनी पड़ी. जिससे पूरे प्रान्त के पटवारी आक्रोशित हैं. और हड़ताल पर चले गए हैं.

संघ के सदस्यों ने बताया कि PV ऐप में काम नहीं करने पर किसान अपना धान नहीं बेच पाएंगे. PV ऐप में काम करना काफी कठिन है. क्योंकि इसे बीच मे बदल दिया जाता है. खसरों की गिरदावरी नहीं होने से धान नहीं चढ़ेगा. उन खसरों का धान बेचने में किसानों को काफी दिक्कतें आएंगी. DCS की टेक्निकल समस्याओं को राज्य स्तर पर ठीक करना काफी जरूरी है.

बस्तर में आई बाढ़ और उससे प्रभावित लोगों में मकान क्षति का कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है. लेकिन फसल क्षति का कार्य रुका हुआ है. कई पटवारियों को 2-3 हल्के का चार्ज दिया गया है. ऐसे में काम करना काफी दिक्कत है. DCS में भी काफी दिक्कतें होती है क्योंकि NIC नया नया एक्सपेरिमेंट करते रहता है. फील्ड में काम करने वाले DCS सर्वेश्वर इतने पढ़े लिखें नहीं हैं. जो उस काम को कर सकें. कम से कम सर्वेयर को सरकार नियुक्त करें और उनको बेहतर ट्रेनिंग दें. ताकि दिक्कतें न हो. पटवारी के पास एक ही काम नहीं है. पटवारियों को काफी काम रहते हैं. सर्वे से लेकर अन्य क्षति व अन्य कार्य. बाढ़ से इंद्रावती नदी के किनारे आने वाले गांव ही बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. बाकी गांवों में ऐसी समस्या नही है. मकान क्षति भी उन्ही गाँवो में हुआ है. जहां बाढ़ का पानी घुस गया था.

पटवारियों की अन्य प्रमुख मांगे वेतन विसंगति और पदोन्नति है. पटवारी पद में देखा गया है कि यदि कोई पटवारी में नियुक्त होता है और 10 साल, 20 साल, 30 साल और कोई कोई 40 साल तक अपनी सेवा देने के बाद भी पटवारी पद में ही रिटायर्ड होते हैं. यह सबसे बड़ी मांग है. इसके लिए सरकार एक समय सीमा निर्धारित करें और चाहे वह 7 साल हो या 10 साल जिसके बाद पदोन्नति की प्रकिया में लिया जाए.

इंद्रावती बचाव समिति के सदस्य लखेश्वर कश्यप का कहना है कि बाढ़ के बाद दिन रात मेहनत करते हुए पटवारी किसानो के बीच रहे. और मकान क्षति सर्वे का कार्य गया. रिपोर्ट भेजा गया. जिसमें कुछ प्रभावितों को मुआवजा भी मिल गया है. बाढ़ में नुकसान हुए फसल का सर्वे नहीं करेंगे तो किसानों को क्षतिपूर्ति राशि कैसे प्राप्त होगा. आधे रास्ते मे छोड़ना ठीक नहीं है. सरकार को पटवारियों की मांग पूरी करनी चाहिए. और फसे हुए किसानों को निकालना चाहिए. ताकि किसान अपना फसल बेच पाए. किसान ने बताया कि फसल निकलने वाला था इसी दौरान बाढ़ की चपेट में आ गया. जिससे फसल पूरी तरह बर्बाद हो गया. धान ना ही निकल पाया और ना ही निकला हुआ धान पक पाया. जिसके सर्वे का काम रुका हुआ है. हड़ताल बंद होने से प्रभावित फसल का सर्वे करेंगे.

पटवारियों के हड़ताल को लेकर अभी तक सरकार के नुमाइंदों ने बातचीत नहीं की है. पटवारियों का कहना है कि यह हड़ताल काफी लंबा चल सकता है.

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