बस्तर दशहरे की परंपरा निभाना पड़ा भारी! जोगी पद बना हल्बा समुदाय के लिए मुसीबत, अगले साल रस्म बंद करने की चेतावनी…..

जगदलपुर- 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे में नवरात्रि के दूसरे दिन जोगी बिठाई की रस्म निभाई जाती है. इस रस्म में जोगी बनकर आमाबाल गांव का युवक 4 फीट गहरे गड्ढे में बैठकर तप करता है. बस्तर दशहरे में जोगी पद की भूमिका निभाने वाले समुदाय के लिए अब यह पद दर्द बन चुका है. क्योंकि प्रशासन ने इनके परिवार के सभी सदस्यों की जाति में जोगी का उल्लेख कर दिया है. जिससे जोगी पद की भूमिका निभाने वाले समुदाय को काफी दिक्कतों का सामन करना पड़ रहा है. खासकर स्कूली बच्चे और नौकरी की तलाश में रहे युवाओं को. क्योंकि आरक्षण में कटौती होती है और स्कोलरशिप में भी दिक्क़ते होती है. इनकी परेशानी को समाप्त करने का वादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी किया था. लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है. जिससे नाराज समुदाय के लोग और खुद जोगी पद में बैठा युवक दौलत ने अगले वर्ष समाधान नहीं होने पर इस रस्म को नहीं निभाने की बात कही है.

जोगी दौलत कुमार नाग ने कहा कि हल्बा जाति के युवा इस रस्म को निभाते हैं. इन सभी जा जाति नहीं बन रहा है. अधिकारी और नेता केवल आश्वासन दे रहे हैं. लेकिन हल नहीं हो रहा है. यदि ऐसा ही होते रहेगा तो अगले साल से कोई भी इसमें शामिल नहीं होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लिखकर दिए थे. लेकिन समाधान नहीं हो रहा है.

दशहरा समिति के सचिव व तहसीलदार राहुल गुप्ता का कहना है कि जाति के संबंध में उन्हें एक ज्ञापन प्राप्त हुआ है. इससे पूर्व भी केंद्र सरकार को इन्होंने अपना आवेदन प्रस्तुत किया था. जिसमें यह बताया गया है शुरू से जोगी के रूप में पूर्वज बैठते आ रहे हैं. लेकिन उनकी जाति हल्बा है. जोगी उनकी जाति नहीं है बल्कि पद है. इस संबंध में आगे पत्राचार किया जाएगा. ताकि जल्द से जल्द उनकी समस्या दूर हो.

जानिए क्या है जोगी बिठाई परंपरा

बस्तर दशहरा पर्व के निर्विघ्न और शांतिपूर्ण आयोजन की कामना को लेकर यह रस्म निभाई जाती है. इस रस्म के तहत ग्राम बड़े आमाबाल के हल्बा समुदाय के युवक दौलत कुमार नाग निभाते हैं. 600 सालों से चली आ रही इस परंपरा को लेकर लोगों में बड़ी आस्था है.

हल्बा जनजाति से जुड़ी जानकारी

हल्बा जनजाति मध्य भारत की एक प्रमुख और प्रभावशाली आदिवासी जनजाति है, जो मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ (बस्तर, कांकेर, दंतेवाड़ा, बालोद, धमतरी) में निवास करती है. हल्बा जनजाति के लोग हल्बी भाषा का इस्तेमाल करते हैं. संविधान के तहत हल्बा को आधिकारिक तौर पर आदिवासी / अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग में रखा गया है.

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