जगदलपुर- विश्व प्रसिद्ध और 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के अंतर्गत सोमवार 12 अक्टूबर की शाम महत्वपूर्ण जोगी बिठाई की रस्म पूरे विधि-विधान से निभाई जाएगी. पर्व के निर्विघ्न और शांतिपूर्ण आयोजन की कामना को लेकर ग्राम बड़े आमाबाल के हल्बा समुदाय के युवक दौलत इस वर्ष लगातार तीसरी बार 9 दिनों की अत्यंत कठिन तप साधना पर बैठेंगे. करीब 600 वर्षों की समृद्ध परंपरा को समेटे इस रस्म की शुरुआत सोमवार शाम मावली मंदिर में पुजारी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ होगी. इसके बाद देवी की पूजा-अर्चना कर वहां स्थापित पवित्र तलवार का विधिवत पूजन किया जाएगा. पूजा संपन्न होने के उपरांत जोगी इसी पावन तलवार को धारणकर मुंडाबाजा और गाजे-बाजे की मंगल धुनों के बीच सिरहसार भवन पहुंचेंगे. वहां प्रार्थना के पश्चात वे सिरहसार भवन में बनाए गए लगभग 4 फीट गहरे गड्ढे में पालथी लगाकर आसन ग्रहण करेंगे और आगामी नौ दिनों के लिए कठिन तपस्या व निराहार व्रत का संकल्प लेंगे.
रियासतकाल में इस रस्म का निर्वहन स्वयं बस्तर के राजा किया करते थे. जिसे कालांतर में हल्बा समाज को सौंप दिया गया. तभी से हल्बा परिवार की पीढ़ियां इस दैवीय दायित्व को पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ निभाती आ रही हैं. पाठजात्रा, डेरी गड़ाई और काछनगादी जैसी महत्वपूर्ण रस्मों के संपन्न होने के बाद आयोजित होने वाले इस गरिमामय अनुष्ठान में दशहरा समिति के सदस्य, मांझी-चालकी, पुजारी और जोगी परिवार के लोग विशेष रूप से मौजूद रहेंगे. जिनकी उपस्थिति में जोगी बस्तर अंचल की सुख-समृद्धि और दशहरे के सकुशल समापन के लिए अखंड साधना में लीन होंगे.