जगदलपुर- विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा केवल एक पर्व नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति, आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक है. इस ऐतिहासिक आयोजन में पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकवादकों की अहम भूमिका रहती है. लेकिन इस बार छह साल से मानदेय नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए 30 मुंडा बाजा वादकों ने दशहरा में शामिल नहीं होने का फैसला किया है. वादकों का कहना है कि जब तक प्रशासन लिखित आश्वासन नहीं देता तब तक वे अपनी पारंपरिक जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे.
मुंडा बाजा वादकों के अनुसार वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा मांझी, मेम्बरिन और मुंडाबाजा वादकों को प्रतिमाह 2000 रुपये मानदेय देने की घोषणा की गई थी. उनका आरोप है कि अब तक उन्हें इसका लाभ नहीं मिला है. इस संबंध में करीब एक महीने पहले बस्तर महाराजा कमलचंद्र भंजदेव, दशहरा समिति अध्यक्ष व सांसद महेश कश्यप, कलेक्टर और जगदलपुर तहसीलदार को आवेदन सौंपा गया था. लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
वादकों को मनाने एसडीएम और आरआई भी पहुंचे. लेकिन वे अपने फैसले पर अडिग रहे. उनका कहना है कि वर्षों से लंबित मांग पर अब केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है. प्रशासन की ओर से लिखित भरोसा मिलने पर ही वे दशहरा में शामिल होने पर विचार करेंगे. अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और दशहरा समिति इस मामले में क्या पहल करते हैं.
बस्तर दशहरे में मुंडा बाजा का विशेष महत्व….
बस्तर दशहरा की पहचान यहां की विशिष्ट जनजातीय परंपराओं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों से जुड़ी है. मुंडाबाजा की धुनें स्थानीय सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक भागीदारी का हिस्सा हैं. पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले वादकों की गैरमौजूदगी से आयोजन की पारंपरिक रंगत प्रभावित होने की आशंका है.