बस्तर- विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा बस्तर में करीब 600 सालों से मनाया जा रहा है. लेकिन बस्तर दशहरे में सबसे महत्वपूर्ण पूजा विधान काछनगादी रस्म को कहा जाता है. इस पूजा विधान में बस्तर राज परिवार को निर्विघ्न रूप से दशहरा मनाने की अनुमति कांटो के झूले में झूलती कुंवारी कन्या देती है. इसके बाद ही राज परिवार दशहरा मनाता है. लेकिन यह परंपरा 600 सालों से नहीं बल्कि करीब 350 सालों से बस्तर में मनाया जा रहा है. आज हम इस रस्म की शुरुआत बस्तर दशहरे में कैसे हुई और कैसे बस्तर राजपरिवार काछन देवी से अनुमति लेने की परंपरा शुरू किये. इसे आज जानेंगे.
माहरा समाज के संभागीय अध्यक्ष राजू बघेल ने बताया कि सन 1700 ई में ऐसी क्यों बनती है कि जब बस्तर राज्य के राजा दलपत देव शिकार करने के लिए जगदलपुर क्षेत्र में आए तब राजा का शिकारी कुत्ता खरगोश को देखकर पीछे है हट गया जबकि ऐसा अमूमन होता नहीं है खरगोश देखते ही कुत्ता उसे पर झपट पड़ता है और उसे नोच लेता है कुत्ते को पीछे हटा देखने के बाद राजा को काफी अचंभा हुआ और किसी अदृश्य शक्ति का होना महसूस किया.
दूसरी घटना ऐसी है कि जब राजा शिकार के लिए इंद्रावती तट पर मौजूद कुम्हडाकोर्ट से होते हुए आगे बढ़ रहे थे. तब उनका घोड़ा और हाथी कुम्हड़ा फूल को देखकर उनके कदम थम गए. और आगे बढ़ नहीं पाए. यहां भी राजा दलपत देव ने अदृश्य शक्ति के होने को महसूस किया. इसके बाद भी वापस राज्य की राजधानी बस्तर लौटे और अपने मंत्रीगण व अन्य सदस्यों से इस विषय में चर्चा करते हुए इसकी जानकारी जुटाने के लिए निर्देशित किए.
इस क्षेत्र में माहरा समाज का एक कबीला हुआ करता था. इस कबीले में कुल 13 मकान थे. 11 माहरा और 2 मुरिया समाज के लोगों का था. इस कबीले का सरदार व प्रमुख जगतु था. जो मुखिया होने के साथ ही सिरहा भी था. और माटी पुजारी भी था. इनसे जब मंत्रिमंडल ने मुलाकात किया, तब कबीले के लोग राजा दलपत देव से मुलाकात किये. मुलाकात में राजा ने आपबीती बताई. जिसके बाद माहरा समाज ने राजा को अपने कबीले में आने और देवी से जानकारी लेने के लिए निमंत्रण दिया. जिसके बाद राजपरिवार और अन्य लोग कबीले में आये.
कबीले में आने के बाद पूजा विधान शुरू किया गया. माहरा समाज की कुंवारी कन्या के ऊपर काछन देवी की सवारी आई. जिसके बाद देवी से बातचीत की गई. देवी आने के बाद राजा ने देवी को आपबीती बताई. और घटनाओं की जानकारी दी. जिसके बाद कबीले के आसपास रहने की इक्षा जताई. जिस पर देवी ने कहा कि क्यों रहना चाहते हो. जिस पर राजा ने कहा कि इस भूमि पर शक्ति है. और जहां राज्य स्थापित करके राज पाठ करना चाहता हूँ. जिस पर हामी भरते हुए देवी ने एक शर्त पर रहने की अनुमति प्रदान की. यदि कोई भी कार्य या पर्व मनाने से पहले देवी की पूजा अर्चना करेंगे. जिसके बाद राजा ने हामी भरी और पूजा विधान शुरू किया गया. जिसके बाद जगतु का जग और दलपत का दल लेकर जगदलपुर नाम बनाया गया. और उस समय से दशहरा पर्व से पहले काछनगादी की रस्म निभाई जाती है. जो आज पर्यन्त तक विधि विधान से निभाई जा रही है. राजा दलपत देव ने भंगाराम चौक में 1772 में एक काछन गुड़ी का निर्माण कराया. जहां इस रस्म को हर साल निभाया जाता है.
कांटो में देवी इसीलिए झूलती है कि उसे देखकर देवी के प्रगट होने का विश्वास लोग कर सकें. ऐसी संस्कृति बस्तर की है. बस्तर में हर जगह लगभग देवी देवता कांटो में झूलते या बैठते हैं. लेकिन उन्हें नुकसान नहीं होता है. सामान्य व्यक्ति कांटो में बैठ या झूल नहीं पायेगा. इस लिहाज से बस्तर का पूजा विधान देशभर से भिन्न है. कांटो के झूले को जामगुड़ा-लामनी के व्यक्ति जो माहरा समाज का है. उसके द्वारा बनाया जाता है. जिसे मान सम्मान व पूजा पाठ के साथ काछन गुड़ी तक पहुंचाया जाता है.