सुकमा (नवीन कश्यप) – आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में माड़वी हिड़मा और उसकी पत्नी राजे की मौत के बाद गुरुवार को उनके गृहग्राम पुवर्ती में अंतिम संस्कार किया गया. आसपास के एक दर्जन गांव के ग्रामीणों और परिचितों की सैंकड़ों की भीड़ अंतिम यात्रा में शामिल हुई और दोनों के पार्थिव शरीरों को गांव के मुख्य मार्ग से होकर श्मशान घाट तक ले जाया गया. विशेष बात यह रही कि दंपति को एक ही चिता पर अग्नि दी गई जिसे देखकर कई ग्रामीणों की आंखें नम हो गई. वहीं इस दौरान गांव में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे, चारों ओर पुलिस और सीआरपीएफ के जवान तैनात किए गए थे, वहीं श्मशान में भी चिता पूरी तरह से जलने तक पुलिस के जवान चारों ओर से तैनात थे.

गुरुवार सुबह के तकरीबन 6-7 बजे माड़वी हिड़मा और पत्नी राजे का शव परिजनों के साथ आंध्रप्रदेश के रम्पासोड़ावराम से पुवर्ती पहुंचा. जिसके बाद देखते देखते आसपास के एक दर्जन गांव जब्बागट्टा, मीनागट्टा, वीरपुरम, पालनार, गोलापल्ली, रायगुड़ा, टेकलगुड़ा, कटडेगुड़ा, पलोड़ी और कई दूूर बसे गांवों से सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण पहुंचे. जिसके बाद दोपहर 12 बजे अंतिम शव यात्रा निकाली गई. जहां दोनों को एक ही चिता पर मुखाग्नि दी गई. हर कोई अपनी आंखों से उस चेहरे को अंतिम बार देखना चाहता था, जिसने बस्तर के जंगलों में दशकों तक खौफ की परिभाषा तय की थी. ग्राम के बुजुर्गों ने कहा कि हमने कई बार उसका नाम सुना उसकी दहशत महसूस की पर गांव में इस रूप में आएगा, यह कभी नहीं सोचा था.

एक ही चिता पर पति-पत्नी की अंतिम विदाई

दोपहर तक शवयात्रा गांव के बाहरी हिस्से में बने अंतिम संस्कार स्थल पर पहुंची. दोनों शव एक-दूसरे के पास रखे गए. किसी ने कोई नारा नहीं लगाया- न लाल सलाम न लाल आतंक का अंत- बस एक गहरी खामोशी. यह खामोशी उस रक्तरंजित इतिहास की थी जिसने बीते तीस सालों में बस्तर की सड़कों, पहाड़ियों और जंगलों को जवानों और ग्रामीणों के खून से भिगो दिया था. परिजनों ने निर्णय लिया कि हिडमा और राजे को एक ही चिता पर अग्नि दी जाएगी. यह निर्णय शायद इस बात का प्रतीक था कि जिस हिंसक रास्ते पर दोनों साथ चले, उसका अंत भी एक ही स्थान पर हो. जैसे ही आग चिता में लगी, महिलाएं रो पड़ीं. कुछ ने चेहरों पर ओढ़नी डाल ली, कई महिलाएं आपस में फुसफुसाते हुए पुरानी घटनाओं को याद करने लगीं. युवाओं के चेहरों पर वर्षों के डर का बोझ उतरता दिखाई दिया, पर मन में राहत की धुंध भी थी.

राजे की कहानी – जंगल की राह, प्यार का सफर और संघर्षों के बीच जीवन

हिडमा के साले ललित मरकाम ने आंखें पोंछते हुए बताया कि राजे, जिसका असली नाम रजक्का था, 1998 में संगठन में शामिल हुई थी. वह कम उम्र में संगठन के प्रभाव में आई. जंगलों में प्रशिक्षण के दौरान उसकी मुलाकात हिडमा से हुई, और धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम पनपा. 2008 में दोनों ने संगठन के भीतर ही शादी की. लेकिन यह बात परिवार को 6 साल बाद, 2014 में पता चली जब वे पहली बार गांव लौटे. ललित ने बताया कि दीदी बहुत सरल थीं- जब भी आतीं, हम बच्चों से पढ़ने को कहतीं. कहती थीं कि जंगल में संघर्ष है पर घर की याद रोज आती है. ललित ने कहा हिडमा हमेशा 70-80 माओवादियों की सुरक्षा में रहता था तो बिना किसी जवान को खरोंच आए ऐसी मुठभेड़ में उसका मारा जाना कई सारे सवाल खड़े करता है.

हिड़मा की हत्या को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा : सोनी सोढ़ी

सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोडी मुठभेड़ पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यह एनकाउंटर नहीं है, माड़वी हिड़मा का हत्या किया गया है. गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाता तो क्या होता. आदिवासी है कहकर हत्या किया गया है. आदिवासी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार शाम 04 बजे किया जाता है. पुलिस प्रशासन जबरन दबाव डालकर 12 बजे अंतिम संस्कार किया गया. उन्होंने कहा कि गुण्डाधुर तीर लेकर लड़े थे और हिड़मा बंदूक लेकर लड़ा है. मेरा हिड़मा दूसरा गुंडाधुर है. हिड़मा की हत्या पर हम जरूर कोर्ट जाएंगे.

आज पूर्वती में तीन भावनाएं दिखाई दी

भय : लोगों को डर है कि संगठन इस मौत का बदला लेने के लिए कुछ कदम उठा सकता है.

दुख : ग्रामीणों के लिए हिडमा या राजे सिर्फ नक्सली नहीं थे – वे गांव के बेटे और बहु भी थे.

राहत : दशकों से गांव जिन खामोश दहशत में जी रहा था, उसकी परत आज कुछ हल्की होती दिखी.

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