जगदलपुर (डेस्क) – छत्तीसगढ़ की माटी से निकले एक जननायक की पहचान तब और गहरी हो जाती है जब वह सत्ता की कुर्सी पर बैठकर भी वनांचल के आखिरी गाँव में रेंगते एक मासूम की सिसकी सुन लेता है. नारायणपुर के सोनपुर बांधपारा के रहने वाले नन्हे प्रवीण नूरेटी की जिंदगी सालों से जमीन की धूल और लाचारी के बीच सिमटी हुई थी. जन्मजात दिव्यांगता के कारण जिस उम्र में बच्चों के पैर तितलियों के पीछे भागते हैं, उस उम्र में पहली कक्षा का यह छात्र अपने हाथों के बल घिसटकर अपनी दुनिया को देखने की कोशिश करता था. प्रवीण की आँखों में बाजार देखने की हसरत थी, दोस्तों के साथ दौड़ने का सपना था, लेकिन गरीबी और शारीरिक अक्षमता की दीवारें बहुत ऊँची थीं. नियति ने उसे रेंगने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन उसे क्या पता था कि उसकी तकदीर बदलने के लिए बस्तर का बेटा और साय सरकार के ताकतवर मंत्री केदार कश्यप खुद आगे आने वाले हैं.

​सोशल मीडिया के गलियारों से गुजरते हुए जैसे ही प्रवीण की बेबसी का वीडियो मंत्री केदार कश्यप की नजरों के सामने आया, उनका राजनैतिक व्यक्तित्व गौण हो गया और एक संवेदनशील पिता का हृदय जाग उठा. केदार कश्यप ने न तो फाइलें मंगवाईं और न ही लंबी कागजी कार्यवाही का इंतजार किया. उन्होंने एक सच्चे ‘हीरो’ की तरह तुरंत मोर्चा संभाला और आधी रात को ही प्रशासन को सख्त लहजे में निर्देश दिया कि 24 घंटे के भीतर उस मासूम तक शासन का सहारा पहुंचना चाहिए. दुर्गम रास्तों और नक्सल प्रभावित क्षेत्र की चुनौतियों को चीरते हुए सरकारी मशीनरी केदार कश्यप के आदेश का पालन करने दौड़ पड़ी. परिणाम यह हुआ कि जिस मासूम ने कल तक सिर्फ ज़मीन देखी थी, उसे अगले ही दिन सिर उठाकर आसमान देखने के लिए नई व्हीलचेयर और ट्राइसाइकिल मिल गई.

​यह महज़ एक उपकरण का वितरण नहीं था, बल्कि यह केदार कश्यप की उस अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण था जो वह अपने क्षेत्र की जनता के प्रति रखते हैं. जब प्रवीण अपनी नई ट्राइसाइकिल पर सवार होकर मुस्कुराया, तो वह मुस्कान इस बात की गवाह थी कि अब सोनपुर जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में गोलियों का शोर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की गूँज है. मंत्री केदार कश्यप ने अपनी इस पहल से यह संदेश दे दिया है कि उनके रहते कोई भी मासूम खुद को लाचार नहीं समझेगा. आज पूरा क्षेत्र केदार कश्यप के इस “सुपरफास्ट न्याय” और उनकी संवेदनशीलता की मिसाल दे रहा है, क्योंकि उन्होंने न केवल प्रवीण को चलने का सहारा दिया, बल्कि एक पिता के संघर्ष को सम्मान और एक बच्चे के सपनों को नए पंख दे दिए हैं.

​”बच्चे की निजता और उसकी मासूमियत के सम्मान को ध्यान में रखते हुए, हम उसकी तस्वीर साझा नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हमारा उद्देश्य उसकी लाचारी दिखाना नहीं बल्कि शासन की संवेदनशीलता और उसकी बदलती तकदीर की कहानी आप तक पहुँचाना है.”

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