सुकमा (डेस्क) – जिले के आदिवासी अंचलों में तेंदूपत्ता संग्रहण से जुड़े हजारों परिवारों की आजीविका इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है. हर साल भीषण गर्मी के मौसम में जंगलों की खाक छानकर और कड़ी मेहनत से तेंदूपत्ता तोड़ने वाले आदिवासी संग्राहकों को यह उम्मीद रहती है कि इस उपज से उन्हें सालभर के लिए जरूरी आर्थिक सहारा मिल जाएगा, लेकिन शासन और वन विभाग की सीमित खरीदी व्यवस्था ने उनकी इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. वर्तमान व्यवस्था के तहत शासन द्वारा तेंदूपत्ता की खरीदी केवल एक निर्धारित लक्ष्य तक ही की जाती है और जैसे ही वह लक्ष्य पूरा होता है, खरीदी प्रक्रिया अचानक बंद कर दी जाती है. इस प्रशासनिक निर्णय के कारण बड़ी मात्रा में तेंदूपत्ता ग्रामीण संग्राहकों के पास ही बचा रह जाता है, जिसके निपटान के लिए वर्तमान में कोई वैकल्पिक सरकारी व्यवस्था मौजूद नहीं है.

​इस स्थिति का सीधा और सबसे घातक असर गरीब आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है. मेहनत से एकत्र किया गया यह “हरा सोना” या तो खुले आसमान के नीचे पड़ा-पड़ा खराब हो रहा है या फिर संग्राहक इसे मजबूरी में बेहद कम दामों पर बिचौलियों को बेचने के लिए विवश हैं. कई मामलों में तो समय पर खरीदार न मिलने से पत्ता पूरी तरह सड़ जाता है, जिससे संग्राहकों की पूरी सीजन की मेहनत शून्य हो जाती है. गौर करने वाली बात यह है कि सुकमा के अंदरूनी इलाकों में रहने वाले परिवारों के लिए तेंदूपत्ता केवल एक मौसमी काम नहीं है, बल्कि यह उनकी जीवन-यापन की धुरी है, जिससे वे अपने बच्चों की शिक्षा, बीमारों का इलाज और अन्य दैनिक जरूरतों को पूरा करते हैं.

​इसी संवेदनशील और ज्वलंत समस्या को प्रमुखता से उठाते हुए कांग्रेस जिलाध्यक्ष हरीश कवासी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने सुकमा कलेक्टर अमित कुमार से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा. इस ज्ञापन में पेसा कानून यानी पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्रों में अधिनियम के प्रावधानों का पुरजोर हवाला दिया गया है. प्रतिनिधिमंडल ने मांग की है कि शासन द्वारा निर्धारित लक्ष्य पूरा होने के बाद जो भी तेंदूपत्ता बच जाता है, उसकी खरीदी का पूर्ण अधिकार संबंधित ग्राम पंचायत और ग्राम सभा को दिया जाना चाहिए. उन्होंने कलेक्टर को अवगत कराया कि पेसा एक्ट के तहत ग्राम सभाओं को अपने स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, उपयोग और प्रबंधन का कानूनी अधिकार प्राप्त है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन अधिकारों के क्रियान्वयन में कमी देखी जा रही है.

​कांग्रेस जिलाध्यक्ष हरीश कवासी ने इस दौरान स्पष्ट किया कि यदि शेष तेंदूपत्ता की खरीदी का जिम्मा ग्राम पंचायतों को मिलता है, तो इससे न केवल संसाधनों की बर्बादी रुकेगी बल्कि आदिवासियों को उनकी मेहनत का वास्तविक मूल्य भी मिल सकेगा. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि पंचायत स्तर पर खरीदी की प्रक्रिया, दर निर्धारण और भुगतान व्यवस्था को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता की गुंजाइश न रहे. उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासी इलाकों में संसाधनों पर पहला हक स्थानीय लोगों का होना चाहिए और यदि ग्राम सभाओं को यह अधिकार मिलता है, तो गांवों में आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. फिलहाल जिले के हजारों आदिवासियों की उम्मीदें अब जिला प्रशासन के रुख पर टिकी हैं कि क्या उन्हें उनकी मेहनत का पूरा हक मिल पाएगा या नहीं.

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