बीजापुर (डेस्क) – ​बीजापुर की पहाड़ियों के सन्नाटे में सिमटी एक ज़िंदगी अब खुशियों की धुन गा रही है. यह कहानी है मड़कम लखमा की, जिसके लिए चलना कभी एक बेबसी थी, और अब ई-ट्राईसाइकिल के पहियों पर यह बेबसी आत्मनिर्भरता में बदल गई है.
​कक्षा तीसरी में हुए एक हादसे ने लखमा की ज़िंदगी को जहाँ रोक दिया था, वहीं पूर्व मंत्री महेश गागड़ा की संवेदनशीलता ने उसे फिर से रफ़्तार दे दी है.

उम्मीद की सवारी पहुंची माओवाद प्रभावित गांव

​इस बदलाव की नींव एक सोशल मीडिया पोस्ट ने रखी. तेलंगाना के एक पत्रकार द्वारा साझा की गई लखमा की लाचारी और संघर्ष की तस्वीरों ने महेश गागड़ा को अंदर तक झकझोर दिया. उन्होंने बिना एक पल की देरी किए, बीजापुर के दुर्गम और माओवादी प्रभावित पामेड़ क्षेत्र के कौर गट्टा गांव तक पहुंचने का दृढ़ निश्चय किया. ​गागड़ा का यह कदम सिर्फ एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक सहृदय इंसान का था, जिसने हर मुश्किल को पार कर मानवता का फर्ज निभाया. गांव पहुँचकर, उन्होंने मड़कम लखमा को ई-ट्राईसाइकिल भेंट की.

“अब जिंदगी रुकती नही, चलती है!”

​आज, जब लखमा अपनी नई सवारी पर निकलता है, तो उसके चेहरे की मुस्कान हजारों शब्दों की कहानी कहती है. वह आत्मविश्वास से कहता है, “अब मैं अपने दम पर चल सकता हूँ, मुझे किसी का सहारा नहीं चाहिए.” ​यह केवल एक वाहन नहीं है, यह आत्म-सम्मान और भविष्य की ओर आगे बढ़ने का भरोसा है.

​महेश गागड़ा ने इस पहल के महत्व को इन प्रेरणादायक शब्दों में व्यक्त किया:

​”अगर एक छोटी पहल से किसी की ज़िंदगी बदल सकती है, तो यही असली राजनीति है — सेवा की. यह ई-ट्राईसाइकिल सिर्फ एक उपहार नहीं, बल्कि उस भरोसे की गाड़ी है जो बीजापुर जैसे इलाकों में धीरे-धीरे लौट रही है.”

​यह घटना साबित करती है कि इंसानियत का रास्ता किसी भी नक्सल असर, दूरी या अभाव से बड़ा होता है. यह सेवा, संवेदनशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदारी की एक उत्कृष्ट मिसाल है.

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