जगदलपुर (डेस्क) – बस्तर जिले में शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए ग्राम पंचायत बड़े चकवा के उपसरपंच पूरन सिंह कश्यप ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार “सुशासन उत्सव” और “रजत जयंती वर्ष” मना रही है, वहीं दूसरी ओर बस्तर के बच्चे बिना किताबों के त्रैमासिक परीक्षा देने को मजबूर हैं, जो किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए शर्मनाक है.
पूरन सिंह कश्यप ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि शैक्षणिक सत्र के पाँच महीने बीत जाने के बाद भी जिले के अनेक प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पाठ्यपुस्तकें वितरित नहीं की गई हैं.
पुस्तकों का घोर अभाव
पूरन सिंह कश्यप के अनुसार, स्थिति इतनी खराब है कि चौथी कक्षा की हिंदी, दूसरी कक्षा की हिंदी, और तीसरी कक्षा की पर्यावरण की पुस्तकें तक बच्चों तक नहीं पहुंची हैं. सबसे गंभीर स्थिति अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में है, जहाँ पहली से लेकर दसवीं तक के विद्यार्थियों को अब तक पुस्तकें नहीं मिली हैं.
उन्होंने कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा, “जब बच्चों के पास किताबें ही नहीं हैं, तो परीक्षा लेने का क्या औचित्य रह जाता है? यह शिक्षा के नाम पर केवल औपचारिकता और बच्चों के भविष्य से खुला खिलवाड़ है.”
‘डबल इंजन’ सरकार के दावों पर प्रश्नचिह्न
उपसरपंच ने “डबल इंजन की सरकार” के दावों को केवल कागजी बताया. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक वितरण में देरी न केवल शिक्षा विभाग की गंभीर लापरवाही है, बल्कि शासन की असंवेदनशीलता को भी उजागर करती है.
”एक ओर सरकार ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ और ‘सबके लिए समान अवसर’ की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर बस्तर जैसे आदिवासी अंचल में बच्चे बुनियादी पाठ्यसामग्री से भी वंचित हैं. यह विरोधाभास सरकार की नीति और नीयत दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है.”
सोची-समझी उपेक्षा का आरोप
पूरन सिंह कश्यप ने यहाँ तक कहा कि यह परिस्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि अनुसूचित क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने की एक सोची-समझी उपेक्षा प्रतीत होती है. उन्होंने कहा कि शिक्षक भी पुस्तकों के अभाव में बच्चों को क्या और कैसे पढ़ाया जाए, इसे लेकर असमंजस में हैं.
पूरन सिंह कश्यप ने केंद्र और राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन की कड़ी आलोचना करते हुए मांग की है कि यदि यही “सुशासन” है, तो सरकार केवल दिखावे का उत्सव मना रही है, जबकि आदिवासी बच्चे अंधकार में धकेले जा रहे हैं. उन्होंने तत्काल पुस्तक वितरण सुनिश्चित करने की मांग की है.