जगदलपुर (डेस्क) – बस्तर जिला प्रशासन द्वारा निजी चिकित्सा संस्थानों पर की गई सख्त कार्रवाई के बाद जहां एक ओर नियमों के पालन का संदेश गया है, वहीं डॉ. मोहन राव क्लीनिक को सील किए जाने के फैसले ने जगदलपुर और आसपास के जिलों के आम लोगों को गहरे सदमे में डाल दिया है. शहर के चौक-चौराहों, चाय की गुमटियों और सार्वजनिक स्थानों पर भी इस कार्रवाई की तीखी चर्चा हो रही है. सोशल मीडिया पर आम लोग अपनी भावनाओं का इजहार कर रहे हैं और इस कार्रवाई को ‘गरीबों के मसीहा’ के साथ अन्याय बता रहे हैं.
प्रशासन ने बेशक अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन पर क्लीनिक को सील कर ₹50,000 का जुर्माना लगाया हो, लेकिन दशकों से बेहद कम शुल्क पर इलाज करने वाले डॉ. मोहनराव के प्रति लोगों का भावनात्मक जुड़ाव इतना गहरा है कि वे इस फैसले को सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई के रूप में नहीं देख रहे.
‘डॉक्टर नही, वो तो भगवान है’ : सोशल मीडिया और सार्वजनिक स्थानों पर छलका दर्द
कुम्हारपारा स्थित डॉ. मोहनराव क्लीनिक, जो दशकों से शहर के सबसे पुराने और भरोसेमंद चिकित्सा केंद्रों में से एक रहा है, खासकर गरीब, मजदूर और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए किसी वरदान से कम नहीं था.
फेसबुक यूजर्स ने कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी
रोहित सिंह आर्य ने इसे ‘व्यस्था के नाम पर केवल वसूली’ बताया और कहा कि शायद यही कारण है कि ‘नब्ज छूकर ₹500/- और टेस्ट व दवाइयों में हजारों खर्च करवाने वाले डॉक्टरों को छोड़कर गरीबों की सेवा करने वाले डॉक्टर की क्लिनिक में ताला जड़ दिया गया है.’

सुरेश महापात्र ने कहा कि उनका परिवार दशकों से क्लीनिक से सेवा ले रहा है और यह ‘बेहद कमज़ोर वर्ग के लोगों के लिए बड़ा आसरा’ है. उन्होंने सवाल किया कि दशकों की सेवा के बाद भी उनकी क्लीनिक ‘पांच सितारा क्यों नहीं बन पाई’, जिसका जवाब है कि वे केवल ‘बीस-पचास रुपए में इलाज करते हैं’ और जेनेरिक दवा की सलाह देते हैं. उन्होंने कार्रवाई तुरंत रोकने की मांग की.

अनियमितता पर कार्रवाई बनाम मानवीय सेवा
हालांकि प्रशासन की मंशा साफ है कि मरीजों की सुरक्षा और निर्धारित मानकों का पालन हो, लेकिन चौक-चौराहों पर हो रही चर्चाओं और जनता की राय में यह कार्रवाई ‘नियमानुसार सही, पर मानवता के विरुद्ध’ है. लोगों का तर्क है कि जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जिंदगी गरीबों की सेवा में लगा दी, उसे इतनी बड़ी सजा देने से पहले प्रशासन को उनकी जनसेवा को भी देखना चाहिए था.
इस कार्रवाई ने बस्तर के स्वास्थ्य जगत में एक भावनात्मक बहस छेड़ दी है: क्या कड़े कानून का पालन करते हुए ऐसे संस्थानों को थोड़ी नरमी नहीं बरती जा सकती, जो व्यावसायिक लाभ से ऊपर उठकर निःस्वार्थ सेवा कर रहे हैं?
जगदलपुर की जनता अब जिला प्रशासन से अपील कर रही है कि वे जुर्माने की राशि लेकर या उन्हें आवश्यक समय देकर क्लीनिक को जल्द से जल्द फिर से खोलने की अनुमति दें, ताकि ‘गरीबों का यह अस्पताल’ बंद न हो. लोगों की उम्मीदें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं.