जगदलपुर (डेस्क) – देश और दुनिया के दशहरे से बिल्कुल अलग और अपनी अनूठी परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा इन दिनों अपने पूरे वैभव पर है. यह महापर्व न केवल 10 दिन का होता है, बल्कि पूरे 75 दिनों तक मनाया जाता है, और सबसे खास बात यह है कि यहां रावण दहन की परंपरा नहीं है.

​बस्तर दशहरा यहाँ की लोक संस्कृति और आदिवासी आस्था का महासंगम है, जिसमें 14 से अधिक अनोखी रस्में निभाई जाती हैं. इन सभी में, नवरात्रि के दौरान होने वाली फूल रथ परिक्रमा मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.

माँ दंतेश्वरी का क्षत्र, विशालकाय रथ पर विराजमान

​बस्तर दशहरे में रावण के पुतले की जगह, बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी के क्षत्र (छतरी) को सम्मान के साथ एक विशालकाय रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण करवाया जाता है. नवरात्रि के तीसरे दिन से शुरू होकर लगातार 6 दिनों तक चलने वाली यह ‘फूल रथ परिक्रमा’ सामाजिक समरसता और सामुदायिक भागीदारी का अद्भुत संदेश देती है.

परंपरा की भव्यता

दो मंजिला रथ : यह विशाल रथ स्थानीय कारीगरों द्वारा साल लकड़ी से बनाया जाता है, जिसे बेहद ख़ूबसूरती से सजाया जाता है. वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, रियासतकाल में इसे विभिन्न प्रकार के फूलों से सजाने के कारण ही इसे ‘फूल रथ’ कहा जाने लगा.

आदिवासियों की आस्था : इस कई टन वजनी रथ को खींचने के लिए कोई मशीन या जानवर नहीं, बल्कि जगदलपुर के आस-पास के दो दर्जन से अधिक गाँवों से आए सैकड़ों माड़िया जनजाति के भक्तजन (आदिवासी) अपनी आस्था और श्रद्धा से खींचते हैं.

राजकीय सम्मान : प्रतिदिन शाम को दंतेश्वरी मंदिर से प्रधान पुजारी क्षत्र को रथ पर विराजमान करते हैं. इस दौरान बस्तर पुलिस के जवान हर्ष फायर कर बंदूक से सलामी देते हैं, जो इस धार्मिक रस्म को एक राजकीय और औपचारिक भव्यता प्रदान करता है.

​ढोल-नगाड़ों, मुंडाबाजा और लोकगीतों की स्वर लहरियों के बीच जब यह फूल रथ नगर की परिक्रमा करता है, तो हजारों की भीड़ इस अनोखे और मनोहारी दृश्य को देखने के लिए उमड़ पड़ती है.

​फूल रथ परिक्रमा के बाद, दशहरे के अंतिम दिनों में आठ चक्कों के विशालकाय विजय रथ की परिक्रमा करवाई जाती है, जो इस 75 दिवसीय महाउत्सव का समापन करती है. बस्तर का यह दशहरा सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी जीवंत रखे हुए है, जो इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में से एक बनाता है.

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