बस्तर दशहरा: 200 साल पुरानी 8 फीट की कालबान बंदूक की हुई पूजा, 20 किलो से ज्यादा है वजन…..

जगदलपुर- छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक मनाये जाने वाले विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरे में विजयदशमी का पर्व बुधवार 21 अक्टूबर को मनाया जा रहा है. विजयदशमी के अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य अपने अश्व और शस्त्र की पूजा अर्चना करते हैं. इसी दिन जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर में ऐतिहासिक शस्त्र को बाहर निकाला जाता है और उसकी पूजा की जाती है. इस बंदूक का नाम कालबान है. सुबह अपने कालबान की पूजा करते हैं. वहीं शाम में वक्त अश्व की पूजा की जाती है. यह पूजाविधान राजमहल के भीतर होता है. इस दिन बस्तरवासियों और पर्यटकों को राजमहल की भीतर प्रवेश करने की अनुमति होती है. इस कारण भव्यता के साथ अश्व की पूजा सैकड़ो लोग देखते है.

दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी उदय पाणिग्राही ने बताया कि विजयदशमी के अवसर पर शस्त्रों की पूजा की जाती है. बस्तर के दंतेश्वरी मंदिर में विशेषकर कालबान बंदूक की पूजा होती है. जो काफी प्राचीन बंदूक है. और पुराने जमाने से इसकी पूजा अर्चना हर विजयादशमी में की जाती है. यह राजा महाराजाओं के जमाने से मंदिर में रखा हुआ है. जिसका नित्य पूजा किया जाता है. और आज इसकी विशेष पूजा होती है. यह भरमार बंदूक है. जिसमें बारूद और छर्रे डालकर चलाया जाता है. एक आदमी इसे उठाकर नहीं रख सकता. क्योंकि यह काफी भारी है.

मेघावती पासकंड की राजकुमारी थी और राजकुमारी मेघावती ने लगभग 200 साल पूर्व कालबान बंदूक बस्तर की आराध्य देवी दंतेश्वरी को भेंट की थी. तब से यह बंदूक दंतेश्वरी मंदिर में रखा हुआ है. यह भरमार बंदूक करीब 8 फीट लंबी और 20 किलो से ज्यादा वजनी हैं. कालबान के साथ ही देवी निशान (लाट) दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित किये जाते हैं. राजमहल परिसर में मंदिर निर्माण के मौके पर सन 1894 में राज परिवार ने मंदिर को सौंपा था. तब से बस्तर दशहरा के दौरान इस लाट को मंदिर में स्थापित करने की परंपरा का निर्वहन करते चले आ रहे हैं. इस कालबान बंदूक और लाट को बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म भीतर रैनी और बाहर रैनी रस्म के लिए मंदिर से पूजा के लिए बाहर निकाला जाता है. और इसका पूजा पाठ किया जाता है.

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