माओवाद की बेड़ियां टूटीं, 40 साल बाद बस्तर दशहरा में लौट रहे जंगलों के देवी-देवता, आस्था, परंपरा और संस्कृति का होगा अनूठा संगम……

जगदलपुर- बस्तर की पहचान सिर्फ घने जंगलों आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक खूबसूरती तक सीमित नहीं है. बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी परंपराएं भी इसे दुनियाभर में अनोखी और विशिष्ट बनाती हैं. इन्हीं परंपराओं में शामिल है 75 दिनों तक चलने वाला विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा. जो अपनी अनोखी व रोचक रस्मों, देवी-देवताओं की आस्था और जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता है. लेकिन इस बार बस्तर दशहरा कुछ ज्यादा ही खास होने जा रहा है. इसकी वजह है माओवाद के प्रभाव से मुक्त होते बस्तर के अंदरूनी इलाकों से देवी-देवताओं की पर्व में वापसी. जो कभी माओवाद के प्रभाव और दुर्गम जंगलों में असुरक्षा के माहौल के कारण बस्तर दशहरा में शामिल नहीं हो पाने वाले कई देवी-देवता अब वर्षों बाद इस ऐतिहासिक पर्व का हिस्सा बनने जा रहे हैं. इनमें कुछ देवी-देवताओं की वापसी करीब चार दशक बाद हो रही है.

बस्तर राजपरिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव ने बताया कि राजपरिवार आवापल्ली, गंगालूर, मद्देड़, ओरछा, अबूझमाड़, ताड़मेटला, मुंडी डोंगरी, तुलसी डोंगरी ये सब ऐसे इलाके थे जहां कोई जाता नहीं था. हम भी हेलीकॉप्टर की सहायता से उन इलाकों तक पहुंचे हुए थे. आज वहां लोग जा रहे हैं. और उन इलाकों से देवी देवता बस्तर दशहरे में शामिल होने आ रहे हैं. उन्हें न्यौता भी भेजा गया है. सबका प्रयास है कि सभी देवी देवता दशहरे में शामिल हों. क्योंकि एक लंबा अंतराल ऐसा था जिसके कारण देवी देवता बस्तर नहीं आते थे. इस बार सभी देवी देवता जिन्हें न्यौता दिया गया है. वो शामिल होंगे आएंगे. उन इलाकों में सड़कों का भी निर्माण हो गया है. इस बार नए देवी देवता देखने को मिलेंगे. हम तो पहले दर्शन किये हैं. लेकिन पर्यटकों और बस्तर के लोगों को देखने मिलेगा. प्राचीन देवी देवता अपनी शक्तियों का आदान प्रदान करेंगे. इस लिहाज से इस साल का दशहरा पर्व काफी आकर्षक होगा. विश्व मे सबसे लंबा चलने वाले इस पर्व को स्थानीय लोगों तक ही नहीं बल्कि पूरे विश्व तक पहुंचाए.

पुजारी रामनाथ मंडावी का कहना है कि उनके बचपन मे उनके पिता और अन्य लोग देवी देवता को लेकर बस्तर दशहरे में शामिल होने पहुंचते थे. लेकिन उनकी मृत्यु व नक्सल प्रभाव के कारण यह परमपरा छूट गई थी. लेकिन अब इसे 40 साल बाद पुनः शुरू किया जा रहा है. राजपरिवार से न्यौता दिया जाता है. और पाम्पलेट भेजा जाता है. खंडाबाबा देवता और उनके पुत्र मुया कुंवारी व काकड़ कोंआ देवताओं को लेकर पहुंचे हैं. जिन्हें आंगादेव कहा जाता है. 60-70 की संख्या में लोग पहुंचे हुए हैं.

पुजारी विशेश्वर मंडावी का कहना है कि पहले नक्सल प्रभाव के कारण नहीं लाते थे. क्योंकि माओवादी गांव गांव में काफी आते थे. लेकिन अब सरेंडर के बाद उनका प्रभाव कम हुआ. इसीलिए पुनः देवी देवताओं को लाया जा रहा है. अब हर साल लाएंगे. करीब 30-40 सालों से यह कार्य बंद था. पहली बार खंडाबाबा देवता के साथ आये हैं.

इस साल बस्तर दशहरा में वर्षों बाद लौट रहे देवी-देवताओं की मौजूदगी पर्व को एक नया आयाम दे सकती है. देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी यह बस्तर की जीवंत आदिवासी संस्कृति को करीब से समझने का अवसर होगा. माओवाद के प्रभाव से प्रभावित रहे क्षेत्रों में शांति और सामान्य जनजीवन की ओर बढ़ते कदमों के बीच देवी-देवताओं की यह वापसी एक सकारात्मक सांस्कृतिक संदेश देती है. यह संदेश कि बस्तर की पहचान केवल संघर्ष और चुनौतियों से नहीं, बल्कि उसकी आस्था, परंपराओं और सामूहिक विरासत से भी है. जंगलों के बीच वर्षों से जीवित रही आस्था अब फिर व्यापक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने जा रही है. यही वजह है कि इस बार का बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परंपराओं की वापसी, सांस्कृतिक पुनर्मिलन और बदलते बस्तर की कहानी भी बनने जा रहा है.

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