सुकमा (नवीन कश्यप) – नक्सल उन्मूलन के इतिहास में वर्ष 2025 एक निर्णायक और ऐतिहासिक साल के रूप में दर्ज हो गया है. जून महीने में कुख्यात कमांडर बसवराजू और उसके बाद खूंखार हिड़मा के सफाए के बाद, सुरक्षाबलों ने माओवाद की कमर तोड़ते हुए अब तक की सबसे बड़ी सामरिक कामयाबी हासिल की है. ओडिशा के कंधमाल में हुए एक भीषण एनकाउंटर में माओवादियों की केंद्रीय समिति (CC) के सदस्य और 1 करोड़ रुपये के इनामी दुर्दांत नेता गणेश उइके को मार गिराया गया है.
सर्जिकल स्ट्राइक जैसा सटीक ऑपरेशन
खुफिया इनपुट के आधार पर ओडिशा पुलिस की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG), CRPF और BSF ने कंधमाल जिले के राम्पा जंगलों में एक संयुक्त मोर्चा खोला. गश्त के दौरान नक्सलियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग शुरू कर दी, जिसके बाद जवानों ने मोर्चा संभाला. घंटों चली इस मुठभेड़ में गणेश उइके समेत कुल 6 माओवादी ढेर कर दिए गए, जिनमें दो महिला नक्सली भी शामिल हैं. मौके से भारी मात्रा में अत्याधुनिक हथियार और विस्फोटक बरामद किए गए हैं.
कौन था गणेश उइके और क्यों था इतना खतरनाक ?

गणेश उइके महज एक नाम नहीं, बल्कि माओवादी संगठन की ‘थिंक टैंक’ यानी केंद्रीय समिति का सबसे प्रभावशाली सदस्य था. हिड़मा की मौत के बाद वह बस्तर डिवीजन और दंडकारण्य क्षेत्र में संगठन का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था.
रणनीतिक मास्टरमाइंड : वह छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में नक्सली नेटवर्क को संचालित करता था.
इनाम की भारी राशि : उसकी दहशत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभिन्न राज्यों ने उस पर कुल 1 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम रखा था.
हमलों का सूत्रधार : सुरक्षाबलों पर बड़े हमलों की योजना बनाने, लेवी वसूली और हथियारों की तस्करी में उसकी मुख्य भूमिका रहती थी.
नक्सली साम्राज्य में मची भगदड़
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि गणेश उइके का मारा जाना माओवादी संगठन के लिए एक “अपूरणीय क्षति” है. एक ही साल के भीतर बसवराजू, हिड़मा और अब गणेश उइके जैसे शीर्ष नेतृत्व के सफाए ने संगठन की रीढ़ तोड़ दी है.
डीआईजी ऑपरेशन अखिलेश्वर सिंह के अनुसार, “यह ऑपरेशन सुरक्षाबलों के बेहतरीन तालमेल का परिणाम है. शीर्ष नेतृत्व के खत्म होने से नक्सली कैडर में भारी दहशत है और उनका नेटवर्क पूरी तरह बिखर चुका है.”
2025 : नक्सलवाद के विरुद्ध ‘अंतिम प्रहार’
वर्ष 2025 में लगातार मिल रही इन सफलताओं ने यह साफ कर दिया है कि भारत से नक्सलवाद का खात्मा अब कुछ ही समय की बात है. सुरक्षाबल अब घने जंगलों के उन कोर इलाकों में घुसकर प्रहार कर रहे हैं, जिन्हें कभी नक्सलियों का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था. गणेश उइके का अंत इस बात का प्रमाण है कि अब नक्सलियों के पास छिपने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है.