जगदलपुर (डेस्क) – केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के स्वरूप और नाम में कथित बदलाव को लेकर छत्तीसगढ़ की सियासत गरमा गई है. आज सोमवार को संभाग मुख्यालय जगदलपुर के संजय मार्केट चौक पर कांग्रेस ने केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ जोरदार हल्ला बोला. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की मौजूदगी में आयोजित इस एक दिवसीय धरने में कांग्रेस ने इसे राष्ट्रपिता की विचारधारा पर सीधा हमला करार दिया.

आस्था और अस्मिता की जंग
धरना प्रदर्शन को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने तीखे तेवर अपनाए. उन्होंने कहा, “भगवान राम पूरे देश की आस्था के केंद्र हैं और हम सबके आराध्य हैं, लेकिन उनके नाम की आड़ लेकर महात्मा गांधी की पहचान को मिटाने की कोशिश करना अत्यंत निंदनीय है. केंद्र सरकार नाम बदलने की राजनीति में अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रही है, जबकि सच्चाई यह है कि गरीब मजदूरों को समय पर उनकी मजदूरी नहीं मिल रही है.”
‘मनरेगा’ को कमजोर करने का आरोप
कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार पर योजना के मूल ढांचे को नष्ट करने का आरोप लगाया. प्रदर्शन के दौरान मुख्य रूप से तीन बातें उभरकर आईं:
● अनुदान में कटौती : कांग्रेस का दावा है कि केंद्र ने मनरेगा के लिए अपना हिस्सा 90 प्रतिशत से घटाकर मात्र 60 प्रतिशत कर दिया है, जिससे राज्यों पर बोझ बढ़ेगा और योजना कमजोर होगी.
● नाम में बदलाव का विरोध : शहर जिला अध्यक्ष सुशील मौर्य ने कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाना उनकी विचारधारा को खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश है.
● रोजगार का अधिकार : वक्ताओं ने याद दिलाया कि 2006 में कांग्रेस शासनकाल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए यह ऐतिहासिक कानून लाया गया था, जिसे अब ‘खत्म’ करने की कोशिश हो रही है.
दिग्गजों का जमावड़ा

जगदलपुर के ऐतिहासिक बाजार परिसर में हुए इस प्रदर्शन में बस्तर कांग्रेस के तमाम बड़े चेहरे नजर आए. पूर्व विधायक रेखचंद जैन, पूर्व महापौर जतिन जायसवाल, शहर अध्यक्ष सुशील मौर्य और महिला कांग्रेस अध्यक्ष लता निषाद सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की. कार्यक्रम का संचालन युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता जावेद खान ने किया.
भविष्य की रणनीति
कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाएगी. पार्टी का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ नाम की नहीं, बल्कि गरीबों के ‘काम के अधिकार’ की है. उन्होंने मांग की कि योजना की मूल पहचान बहाल की जाए और मजदूरों के भुगतान में हो रही देरी को तुरंत दूर किया जाए.