सुकमा (नवीन कश्यप) – कभी बंदूक थामे पहाड़ों में डर फैलाने वाले अब समाज के बीच उम्मीद की कहानी लिख रहे हैं. छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में आज ऐसा ही दृश्य देखने को मिला जब 27 सक्रिय माओवादियों, जिनमें 10 महिलाएं और 17 पुरुष शामिल हैं, ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय सुकमा में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का संकल्प लिया.
इनमें से कई चेहरे कभी जंगलों में खौफ का पर्याय थे, पर आज उन्हीं हाथों ने फूलों से स्वागत स्वीकार किया. आत्मसमर्पित माओवादियों में पीएलजीए बटालियन नंबर 01 के दो हार्डकोर नक्सली भी शामिल हैं, जिन पर कुल 50 लाख रुपये का इनाम घोषित था. सबसे बड़ा नाम ओयाम लखमू (10 लाख ईनामी) का है, जो वर्षों से बटालियन 01 के हेड क्वार्टर प्लाटून में कमांडर की भूमिका निभा रहा था.
पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण के निर्देशन में यह आत्मसमर्पण “छत्तीसगढ़ नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025” और “नियद नेल्ला नार” योजना की बड़ी सफलता मानी जा रही है. हाल के महीनों में पुलिस ने लगातार अंदरूनी इलाकों में कैंप स्थापित किए हैं — इन्हीं प्रयासों के कारण अब माओवादी संगठन के भीतर दरारें साफ दिखने लगी हैं.
डीआरजी, जिला बल, सीआरपीएफ, एसटीएफ और कोबरा बटालियन की इंटेलिजेंस टीमों ने महीनों तक संवाद और भरोसे का पुल बनाने में अहम भूमिका निभाई. आत्मसमर्पण करने वालों में कई युवा हैं जो बचपन में संगठन से जुड़े थे, पर अब शिक्षा और रोजगार की राह पर लौटना चाहते हैं.

एसपी किरण चव्हाण ने कहा – यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है. ये वे लोग हैं जो कभी बंदूक के रास्ते पर भटके थे, आज उन्होंने विकास, शिक्षा और शांति का रास्ता चुना है. शासन की नीतियां अब जमीनी स्तर पर असर दिखा रही हैं. हम हर आत्मसमर्पित साथी का स्वागत करते हैं और उन्हें सुरक्षित भविष्य देने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
पुलिस अधीक्षक के साथ इस मौके पर डीआईजी ऑफिस सुकमा के द्वितीय कमान अधिकारी सुरेश सिंह पायल, कोबरा 203 बटालियन के गौरव कुमार, सीआरपीएफ 131 व 217 वाहिनी के अधिकारी, और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रोहित शाह व अभिषेक वर्मा मौजूद रहे.
सभी आत्मसमर्पित नक्सलियों को शासन की नई नीति के तहत 50-50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि और पुनर्वास सुविधाएं दी जाएंगी.
इन माओवादियों में कुछ बीजापुर व कोंटा के इलाकों से हैं, जो अब गांव लौटकर खेती, पशुपालन और शिक्षा के माध्यम से नई जिंदगी शुरू करने की इच्छा जता रहे हैं.
सुकमा पुलिस के लिए यह आत्मसमर्पण सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उन लोगों के भीतर उपजे विश्वास का प्रतीक है जो कभी बंदूक से बदलाव चाहते थे – और अब विकास से.
यह आत्मसमर्पण साबित करता है कि जब सरकार और समाज मिलकर “संवाद का रास्ता” अपनाते हैं, तो “संघर्ष की आग” खुद बुझ जाती है. सुकमा में यह दिन अब शांति की ओर बढ़ते बस्तर का एक नया अध्याय बन गया है.