जगदलपुर (डेस्क) – 26 अगस्त को आई भयंकर बाढ़ की तबाही का दर्द बस्तर में लगभग 40 दिनों बाद भी कायम है. बाढ़ से टूटी सड़कें और पुल-पुलिया अब भी जस के तस हैं, जिससे आवागमन मुश्किल हो गया है. शासन-प्रशासन से लगातार गुहार लगाने के बावजूद कोई मदद न मिलने पर, सालेपाल और बारूपाटा ग्राम पंचायतों के सैकड़ों ग्रामीणों ने बुधवार को श्रमदान का बीड़ा उठाया. ​ग्रामीण अपनी रापा, तगाड़ी, गैती और ट्रैक्टर लेकर सुबह से ही क्षतिग्रस्त सड़क पर जुट गए और खुद ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया.

‘सरकार का काम हम क्यों कर रहे है ?’

​ग्रामीणों के इस कदम ने प्रशासन की घोर अनदेखी को उजागर कर दिया है. जनपद सदस्य अनिल मंडावी ने बताया कि मदद न मिलने के बाद ग्राम सभा की बैठक में यह निर्णय लिया गया. उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बाढ़ के बाद कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि निरीक्षण के लिए क्षेत्र में नहीं आया, जबकि सबको सड़क टूटने की जानकारी है. इसी टूटे पुल पर गिरकर एक युवक की मौत भी हो चुकी है.

​क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि सहदेव नाग ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “ग्रामीणों ने जिला कार्यालय और विधायक के समक्ष भी मांग रखी, लेकिन उनकी समस्याओं को अनदेखा किया गया. भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार होने के बावजूद किसी ने सुध नहीं ली. दुख की बात है कि जो काम सरकार और जिम्मेदारों का है, वह ग्रामीण खुद मजबूरी में कर रहे हैं.”

1 किलोमीटर का रास्ता बना 12 किलोमीटर

​बारूपाटा के सरपंच मनीराम बेंजाम ने बताया कि सड़क टूटने से बस्तर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मिचनार तक जाने में भारी कठिनाई हो रही है. उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि 1 किलोमीटर का रास्ता अब घूमकर 12 किलोमीटर हो गया है. राशन के लिए भी लोगों को इतनी ही दूरी तय करनी पड़ रही है.

​सुबह 6 बजे से काम में जुटे ग्रामीण शंकर ने बताया कि उन्होंने संकल्प लिया है कि काम पूरा करके और सड़क बनाकर ही वापस घर लौटेंगे. निर्माण कार्य में बच्चे, बुजुर्ग, और महिलाएं सभी शामिल हैं, और सामूहिक सहयोग से भोजन की व्यवस्था भी की जा रही है ताकि काम जल्द से जल्द पूरा हो सके.

​ग्रामीणों के इस सामूहिक प्रयास ने न केवल उनकी एकजुटता को दर्शाया है, बल्कि प्रशासन के लचर रवैये पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

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