जगदलपुर (डेस्क) – बस्तर ने आज पत्रकारिता के अपने ‘भीष्म पितामह’ को खो दिया. 14 जुलाई, 1946 को जन्मे वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेंद्र बाजपेयी का निधन पत्रकारिता जगत के लिए एक गहरा आघात है. उनका जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस साहस और समर्पण का जाना है, जिसने बस्तर की पत्रकारिता को एक नई पहचान दी.

​अपने जीवन की शुरुआत पीडब्ल्यूडी के मैकेनिकल विभाग में सरकारी नौकरी से करने वाले श्री बाजपेयी ने जल्द ही इस रास्ते को छोड़कर पत्रकारिता को अपना जीवन समर्पित कर दिया. उनकी यह यात्रा 1980 के दशक में साप्ताहिक अखबार ‘बस्तर टाइम्स’ से शुरू हुई. उनकी कलम ने न सिर्फ समाचारों को आवाज दी, बल्कि बस्तर के समाज और संघर्षों को भी दुनिया के सामने रखा.

​वर्ष 1980 में, उन्होंने बस्तर के दिग्गज पत्रकारों पोला सिंह, बसंत अवस्थी, भरत अग्रवाल, किरीट दोषी, एस. करीमुद्दीन, रवि दुबे और डी.एस. नियाजी के साथ मिलकर बस्तर जिला पत्रकार संघ की स्थापना की. उसी समय, उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से पत्रकार भवन के लिए भूखंड की मांग की, जिसे तुरंत मंजूरी मिल गई. आज भी, जगदलपुर का पत्रकार भवन पिछले 45 वर्षों से उनकी दूरदर्शिता और पत्रकारों की एकजुटता का प्रतीक है.

​श्री बाजपेयी की पत्रकारिता सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं थी. उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर नक्सली आंदोलनों की रिपोर्टिंग की और निर्मल सोनी प्रकरण में नक्सलियों से बात कर उनकी रिहाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनका मार्गदर्शन और अनुभव कई पीढ़ियों के पत्रकारों के लिए एक पाठशाला जैसा था. उनके पुत्र रजत बाजपेयी भी उनके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं.

​आज, जब बस्तर ने अपने सबसे बड़े मार्गदर्शक को खो दिया है, उनकी स्मृतियाँ, उनकी निर्भीक रिपोर्टिंग और पत्रकारिता के प्रति उनका अटूट समर्पण हमेशा प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे. यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक युग के अंत की घोषणा है.

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