सुकमा (डेस्क) – जिला मुख्यालय से सटे टेटरई क्षेत्र के ग्रामीणों की वर्षों पुरानी पक्की सड़क की आस पर महज कुछ दिनों की बारिश ने पानी फेर दिया. बोड्डीगुड़ा से टेटरई को जोड़ने वाली यह अधूरी पक्की सड़क हाल की बारिश में बह गई, जिससे गांव का संपर्क पूरी तरह टूट गया है. इससे न केवल ग्रामीणों की आवाजाही ठप हो गई है, बल्कि आपात स्थिति में एंबुलेंस जैसी सुविधाएं भी गांव तक नहीं पहुंच पा रही हैं.

जानकारी के अनुसार इस मार्ग का निर्माण लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा बीते तीन वर्षों से किया जा रहा था. दो – तीन महीने पहले ही मिट्टी, मुरुम और डब्ल्यूबीएम का कार्य पूरा कर इसे उपयोग के लिए खोला गया था. यह सड़क टेटरई, पुजारीपारा सहित कई गांवों को नेशनल हाईवे और जिला मुख्यालय से जोड़ती है. लेकिन 15 जुलाई को हुई मूसलाधार बारिश के बाद सड़क का बड़ा हिस्सा पानी में बह गया.

स्थानीय ग्रामीण कुर्रम एंका ने बताया, “सड़क बनने से गांव वालों में उम्मीद जगी थी, लेकिन पहली ही बारिश ने सब खत्म कर दिया. अब न वाहन आ सकते हैं न कोई बीमार अस्पताल जा सकता है.” उन्होंने आरोप लगाया कि निर्माण के दौरान पुलिया नहीं बनाई गई, जिससे पानी का निकास नहीं हो सका और सड़क बह गई.

गांव के लोगों ने वैकल्पिक रास्ता बनाने की कोशिश की है, लेकिन वह अस्थायी और खतरनाक है. बाइक सवारों और साइकिल चालकों को जान जोखिम में डालकर आना – जाना पड़ रहा है. छात्र, मजदूर और ग्रामीण महिलाएं फिसलन भरे रास्तों से होकर गुजरने को मजबूर हैं.

ग्रामीणों ने निर्माण कार्य में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि विभाग ने बिना उचित जल निकासी व्यवस्था के अधूरी सड़क का काम किया. इससे बारिश का पानी सड़क को काटता चला गया. अब स्थिति यह है कि ग्रामीण एक बार फिर पुराने हालात में लौट गए हैं जहां हर बारिश के साथ गांव अलग – थलग पड़ जाता है.

इस मामले में जब पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन अभियंता आलोक ध्रुव से संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि स्थल का निरीक्षण किया गया है. “कलेक्टर के निर्देश पर जल्द ही पाइपलाइन डालकर अस्थायी रास्ता बनाया जाएगा और स्थायी पुलिया निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी.”

हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि जब तक मजबूत पुलिया और पक्की सड़क नहीं बनती, तब तक हर साल बारिश उनके लिए संकट का समय बना रहेगा. उनका साफ कहना है कि अब सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा, जमीनी काम होना चाहिए.

यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की हालत अब भी दयनीय है. स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी ऐसे गांव विकास की मुख्यधारा से जुड़े नहीं हैं. ग्रामीणों की एक ही मांग है कि स्थायी, मजबूत और जिम्मेदार निर्माण, ताकि उनका जीवन सुरक्षित और सुगम हो सके.

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