सुकमा (नवीन कश्यप) – बस्तर की बीहड़ वादियों में जहां गोलियों की गूंज और माओवाद की त्रासदी आज भी लोगों को सहमा देती है, वहीं ऐसे अंधेरे में उम्मीद की किरण बनकर सामने आए हैं एक डॉक्टर, डॉ. मुकेश बक्शी जो मूलतः कवर्धा के रहने वाले है और 2009 से सुकमा जिले के अत्यंत संवेदनशील, माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्र चिंतागुफा में तैनात इस ग्रामीण चिकित्सक को हाल ही में बस्तर के RMA संगठन द्वारा “ग्रामीण चिकित्सा सम्मान” से सम्मानित किया गया. यह सम्मान उन्हें भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक किरण देव के कर कमलों से प्रदान किया गया.
इस गरिमामयी अवसर पर संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं बस्तर, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जगदलपुर, और बस्तर के कई वरिष्ठ चिकित्सकगण उपस्थित रहे. डॉ. बक्शी का सम्मान, न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी सेवाओं की स्वीकृति है, बल्कि बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण इलाके में उनके संघर्ष और मानवता की सेवा का प्रमाण भी है.
वो डॉक्टर जिसने जंगल में अस्पताल को जिंदगी दी
चिंतागुफा, जहाँ पुलिस और सुरक्षाबलों को भी विशेष रणनीतियों के तहत प्रवेश करना होता है, वहाँ डॉ. मुकेश बक्शी वर्षों से चिकित्सा सेवा दे रहे हैं. यह कोई साधारण सेवा नहीं, बल्कि मौत के साए में उम्मीद का दीप जलाना है. उन्होंने नक्सल क्षेत्र के हर गांव, हर कुटिया, हर घायल और बीमार इंसान तक अपनी सेवा पहुंचाई चाहे सामने गोलियों की बौछार हो या दुर्गम पहाड़ी रास्ता.
सम्मानों की फेहरिस्त नही, संघर्षों की कहानी है यह
डॉ. बक्शी को वर्ष 2017 में “धनवंतरि सम्मान”, 2019 में “हेल्थ आइकन अवॉर्ड”, तथा 2023-24 में जिला सुकमा के चिंतागुफा स्वास्थ्य केंद्र को “अस्पताल गुणवत्ता मानक प्रमाणित” कराने का श्रेय मिला. राजधानी रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री एवं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की उपस्थिति में उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया गया.
लेकिन सबसे बड़ी पहचान उन्हें तब मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘हेल्थ टॉक शो’ में उनके कार्यों की विशेष रूप से प्रशंसा की. यह उस ग्रामीण डॉक्टर की गवाही थी जो न किसी समाचार की सुर्खी बना, न मंचों पर भाषण देता है बल्कि चुपचाप ज़मीन पर काम करता है.
जब माओवादी हमले में घिरी एम्बुलेंस, फिर भी नही रुकी सेवा
डॉ. बक्शी की ज़िंदगी के कुछ पल आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं. एक बार वह स्वयं एम्बुलेंस लेकर गंभीर रोगी को लाने निकले, तभी माओवादियों के एंबुश में फंस गए. एम्बुलेंस पर आठ गोलियां चलीं, लेकिन बक्शी डरे नहीं उन्होंने न केवल मरीज को सुरक्षित लाया, बल्कि अगले ही दिन फिर से सेवा में लौट आए. इस घटना के बाद प्रशासन और आम जनता के बीच उनकी छवि ‘बस्तर के सच्चे मसीहा’ के रूप में बनी.
बाइक पर गर्भवती महिला को लाया अस्पताल

चिकित्सकीय सेवा केवल दवाइयों तक सीमित नहीं होती, कभी – कभी यह संवेदनशीलता, साहस और इंसानियत की परीक्षा बन जाती है. एक बार चिंतागुफा में सड़कें इतनी खराब थीं कि एम्बुलेंस का पहुँचना असंभव था. उस समय डॉ. बक्शी ने गर्भवती महिला को खुद बाइक पर बैठाया और कई किलोमीटर तक दुर्गम रास्ता पार कर अस्पताल पहुँचाया. माँ और बच्चे दोनों की जान बची. यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हुई गांव के ग्रामीणों से लेकर अधिकारियों और राष्ट्रीय मीडिया ने भी डॉक्टर की मानव सेवा को सराहा.
बस्तर का यह डॉक्टर अब अंतरराष्ट्रीय पहचान तक पहुंचा
डॉ. बक्शी के कार्यों को देखते हुए वर्ष 2017 में छत्तीसगढ़ राज्य की स्वास्थ्य टीम के साथ उन्हें श्रीलंका जैसे दूसरे देशों में मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के लिए भेजा गया. जंगलों में स्वास्थ्य सेवा के उनके अनुभव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा किया गया. यह न केवल उनका बल्कि पूरे बस्तर के लिए एक गौरव का क्षण था.
चिंतागुफा जैसे गांव, जहाँ पहले लोग डॉक्टर का नाम सुनकर डरते थे या अंधविश्वास में इलाज से भागते थे, वहीं आज डॉ. बक्शी की वजह से स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आई है. माँ – बाप अपने बच्चों को टीका लगवाने लाते हैं, गर्भवती महिलाएं प्रसव के लिए अस्पताल आती हैं और मलेरिया, डेंगू जैसे रोगों पर नियंत्रण पाया गया है.
सम्मान से ज्यादा सेवा का संकल्प
सम्मान मिलना उनके लिए गर्व की बात है, लेकिन डॉ. बक्शी की विनम्रता सबका दिल जीत लेती है. उन्होंने सम्मान लेने के बाद कहा कि “मैंने जो किया, वो मेरा कर्तव्य था. बस्तर की धरती ने मुझे अवसर दिया कि मैं कुछ कर सकूं. जब तक साँसे हैं, सेवा करता रहूँगा.”
उनका यह कथन हर उस युवा को प्रेरणा देता है जो सच्चे अर्थों में समाज सेवा करना चाहता है.

“बस्तर के बेटा, बस्तर के लिए समर्पित”
डॉ. मुकेश बक्शी कोई सामान्य चिकित्सक नहीं वह एक मिशन हैं, जो बस्तर को स्वस्थ और सशक्त बनाने के लिए दिन – रात समर्पित हैं. उनकी संघर्षगाथा यह बताती है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो जंगलों के बीच भी उम्मीद की रोशनी जलाई जा सकती है.
बस्तर के हर गांव में, हर इंसान में, डॉ. बक्शी के प्रति सम्मान है. और अब जब उन्हें ‘ग्रामीण चिकित्सा सम्मान’ मिला है, तो यह न केवल एक व्यक्ति का सम्मान है बल्कि उन सभी गुमनाम योद्धाओं की पहचान है, जो विकास के सबसे निचले पायदान पर खड़े रहकर भी बदलाव की मशाल थामे हुए हैं.