दंतेवाड़ा (कवि सिन्हा)। बस्तर अपने आप में अनोखा है। यहां के लोग, उनकी संस्कृति, रहन- सहन, खान-पान अनायास ही सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। यहां आदिवासियों की कई परम्पराएं ऐसी हैं जो आपको सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन ये कई मायनों में बेहद खास होते हैं। आपने अच्छी बारिश के लिए मेंढक – मेंढकी की शादी, भीमसेन पत्थर को हिलाने की परंपरा के बारे में तो अवश्य सुना होगा। लेकिन क्या आपने प्रमुख वनोपज महुआ फूल की अच्छी पैदावार के लिए पेड़ो की शादी के बारे में कभी सुना है ? दंतेवाड़ा जिले के गीदम विकासखंड के मंदिरों की नगरी बारसूर में देवगुड़ी स्थल के पास ग्रामीणों ने महुआ पेड़ की शादी रचाई। इलाके के सिरहा, गुनिया, बैगा समेत ग्राम प्रमुख के साथ एक जगह इकट्ठा हुए। उन्होंने महुआ फूल की अच्छी पैदावार के लिए आदिवासी रीति रिवाज अनुसार महुआ पेड़ का विवाह सम्पन्न करवाया।

वाद्य यंत्रों की थाप पर थिरके ग्रामीण

यहां के ग्रामीणों ने बताया कि, जिस प्रकार आदिवासी संस्कृति में दूल्हा – दुल्हन को तेल हल्दी चढ़ाई जाती है, ठीक उसी प्रकार महुआ पेड़ के तनों में भी तेल हल्दी चढ़ाई गई। यहां के ग्रामीण पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर भी थिरके। इस बीच शहनाई भी बजाई गई। यहाँ के ग्रामीण खुद घराती और बराती बने। आदिवासी रीति – रिवाज के अनुसार महुआ के पेड़ों का विवाह संपन्न कराया गया। शादी के बाद ग्रामीण महुआ पेड़ की परिक्रमा लगाकर जमकर थिरके। लोगों ने इस अवसर पर कई तरह के पारंपरिक गीत भी गाए।

सदियों से चली आ रही परंपरा

ग्रामीणों ने जानकारी देते हुए बताया कि, पेड़ों की शादी की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। महुआ फूल की अच्छी पैदावार के लिए महुआ पेड़ की शादी करवाई गई।

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