विशेष खबर (नवीन कश्यप) – छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्र अबूझमाड़ की धरती से निकलकर जिस खिलाड़ी ने अपनी मेहनत और फौलादी इरादों से देश भर में जिले का मान बढ़ाया, आज उसी खिलाड़ी को अपने ही घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है. बॉडी बिल्डिंग में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर नारायणपुर का नाम रोशन करने वाली खुशबू नाग को प्रतिष्ठित ‘अबूझमाड़ मैराथन’ से बाहर रखे जाने की खबर ने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है. यह घटना न केवल एक प्रतिभावान खिलाड़ी का अपमान है, बल्कि यह जिला प्रशासन की खेल नीति और स्थानीय प्रतिभाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता पर भी एक गहरा सवालिया निशान लगाती है.
हैरानी की बात यह है कि जहाँ एक ओर प्रशासन ने बाहर से आए खिलाड़ियों और आयोजन की चकाचौंध पर लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए, वहीं जिले की अपनी बेटी को इस मंच का हिस्सा बनने तक का मौका नहीं दिया गया. स्थानीय खेल प्रेमियों का कहना है कि अगर इस तरह के बड़े आयोजनों का उद्देश्य केवल फोटो खिंचवाना और इवेंट मैनेजमेंट है, तो फिर खेलो इंडिया और बेटी बचाओ जैसे नारों का कोई औचित्य नहीं रह जाता. सूत्रों के अनुसार, खुशबू नाग ने इस आयोजन में सहयोग और भागीदारी के लिए कई बार प्रशासनिक गलियारों के चक्कर काटे, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन और निराशा ही हाथ लगी. यह उस सिस्टम की कड़वी हकीकत है जो खिलाड़ी के मेडल जीतने पर तो बधाई देने की होड़ मचाता है, लेकिन जब उसी खिलाड़ी को अभ्यास और मंच की ज़रूरत होती है, तो हाथ पीछे खींच लेता है.
नारायणपुर जैसे संवेदनशील और आदिवासी बहुल क्षेत्र में, जहाँ खेल युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है, वहाँ एक स्थापित खिलाड़ी के साथ ऐसा व्यवहार भविष्य की प्रतिभाओं का मनोबल तोड़ने वाला है. विशेषकर जिले की कमान एक महिला कलेक्टर के हाथों में होने के बावजूद, एक महिला खिलाड़ी के संघर्ष को इस तरह नजरअंदाज किया जाना चर्चा का विषय बना हुआ है. लोग अब खुलेआम पूछ रहे हैं कि क्या जिले की खेल नीतियां सिर्फ कागजों पर बाहरी चेहरों को चमकाने के लिए बनी हैं? यदि स्थानीय स्तर पर संघर्ष कर रहे खिलाड़ियों को ही संसाधन और सम्मान नहीं मिलेगा, तो आने वाले समय में जिले की अन्य बेटियां मैदान में उतरने का साहस कैसे जुटा पाएंगी? फिलहाल इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है और अब जनता प्रशासन से इस भेदभाव पर जवाब मांग रही है.