बीजापुर (डेस्क) – छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले से शिक्षा व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है. रसोइयों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने जिले की ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की कमर तोड़ दी है. हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वे बच्चे आज जंगलों में लकड़ियां बीनने और बोरवेल से पानी ढोने को मजबूर हैं.
एकल शिक्षक स्कूलों में ‘ब्लैकआउट” जैसी स्थिति
सबसे भयावह स्थिति उन स्कूलों की है जो ‘एकल शिक्षक’ के भरोसे चल रहे हैं. जिले के कई प्राथमिक स्कूलों में एक ही शिक्षक पर पहली से पांचवीं तक की पांच कक्षाओं को पढ़ाने का जिम्मा है. अब रसोइयों की अनुपस्थिति के कारण इन शिक्षकों के सामने “पढ़ाएं या खाना बनाएं” का संकट खड़ा हो गया है. शिक्षक कक्षा छोड़कर रसोई में दाल-सब्जी छौंक रहे हैं, जिससे पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई है. यह स्थिति न केवल शिक्षा के अधिकार (RTE) का मखौल उड़ा रही है, बल्कि सरकारी दावों की जमीनी हकीकत भी बयां कर रही है.
मजदूरी करने को मजबूर नौनिहाल
हड़ताल का सबसे काला पक्ष यह है कि शिक्षक अकेले व्यवस्था नहीं संभाल पा रहे हैं. मजबूरी में छोटे-छोटे स्कूली बच्चे उनकी मदद कर रहे हैं, बच्चे स्कूल के पास के जंगलों में जाकर सूखी लकड़ियां इकट्ठा कर रहे हैं. पीने और खाना बनाने के पानी के लिए बच्चे बोरवेल पर लंबी कतारें लगा रहे हैं. दोपहर के भोजन की व्यवस्था में ही पूरा समय निकल जाने के कारण स्कूल महज ‘मिड-डे मील’ सेंटर बनकर रह गए हैं.
प्रशासन की चुप्पी और बढ़ता संकट
एक तरफ रसोइया अपनी मांगों को लेकर अड़े हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन की ओर से अब तक कोई वैकल्पिक ठोस व्यवस्था नहीं की गई है. ग्रामीण क्षेत्रों में पालकों के बीच भारी रोष व्याप्त है. यदि समय रहते कोई समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संकट बच्चों के ड्रॉप-आउट दर को बढ़ा सकता है और कुपोषण जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है.