बीजापुर (डेस्क) – छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में वन विभाग ने एक ऐतिहासिक लेकिन चुनौतीपूर्ण कदम उठाते हुए 31 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ‘कूप कटाई’ (पेड़ों की कटाई) की प्रक्रिया फिर से शुरू कर दी है. वर्ष 1993 के बाद यह पहला अवसर है जब इस वन वृत्त में इतने बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक तरीके से वन प्रबंधन का कार्य किया जा रहा है. हालांकि, शासन के इस फैसले ने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है, वहीं स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों का हनन बताते हुए विरोध शुरू कर दिया है.

12,443 पेड़ों पर चलेगी आरी, समितियों को मिलेगा लाभ

​वन विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस चरण में कुल 12,443 पेड़ों को कटाई के लिए चिन्हांकित किया गया है. डीएफओ बीजापुर रंगानाधा रामकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी प्रक्रिया स्वीकृत गाइडलाइन और वैज्ञानिक कार्ययोजना के तहत की जा रही है.

आर्थिक लाभ : पेड़ों की नीलामी और बिक्री से प्राप्त होने वाली रॉयल्टी का 20 प्रतिशत हिस्सा संबंधित ग्रामीण वन समितियों को दिया जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के स्रोत बढ़ेंगे.

वैज्ञानिक आधार : विभाग का दावा है कि यह कटाई वनों के स्वास्थ्य और नए पौधों के संवर्धन के लिए आवश्यक है.

1994 की आगजनी के बाद थमा था काम

​बीजापुर में कूप कटाई का इतिहास बेहद संवेदनशील रहा है. आखिरी बार 1993 में यहाँ कटाई हुई थी, लेकिन 1994 में नक्सलियों ने इस प्रक्रिया के विरोध में बड़े पैमाने पर आगजनी की घटना को अंजाम दिया था. सुरक्षा कारणों और बढ़ते नक्सलवाद के चलते तीन दशकों तक वन प्रबंधन की यह पूरी प्रक्रिया ठप रही. अब सुरक्षा स्थिति में आए सुधार और शासन की नई नीतियों के बाद इसे दोबारा शुरू किया गया है.

छिड़ा विवाद

​वन विभाग के इस कदम का क्षेत्र में कड़ा विरोध भी शुरू हो गया है. आदिवासी संगठनों और स्थानीय ग्रामीणों ने शासन की इस मंशा पर सवाल उठाए हैं.

ग्रामीणों का तर्क : “पेसा एक्ट और संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत वनों और प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम सभा का पहला अधिकार है. बिना ग्राम सभा की वास्तविक सहमति के जंगलों की कटाई करना आदिवासियों के हक पर डाका डालने जैसा है.”
​ग्रामीणों का आरोप है कि परामर्श की प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित है, जबकि धरातल पर उनकी आवाज़ नहीं सुनी जा रही है.

चुनौतियां और सुरक्षा

​तीन दशक बाद शुरू हुई इस प्रक्रिया को नक्सल मोर्चे पर भी एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. जहाँ प्रशासन इसे विकास और प्रबंधन से जोड़ रहा है, वहीं विरोध के सुरों ने प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था और जन-विश्वास को बनाए रखने की नई चुनौती पेश कर दी है.

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