बीजापुर (डेस्क) – छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में तीन दशकों का लंबा इंतजार खत्म हुआ है. बीजापुर वन वृत्त में वर्ष 1993 के बाद पहली बार कूप कटाई की प्रक्रिया दोबारा शुरू की गई है. जहाँ वन विभाग इसे जंगलों के स्वास्थ्य और वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए अनिवार्य बता रहा है, वहीं स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों पर हमला करार देते हुए विरोध तेज कर दिया है.

12,443 पेड़ों पर चलेगी कुल्हाड़ी, समितियों को मिलेगी 20% रॉयल्टी

​वन विभाग के डीएफओ रंगानाधा रामकृष्ण ने जानकारी दी कि इस चरण में कुल 12,443 पेड़ों को कटाई के लिए चिन्हांकित किया गया है. विभाग के अनुसार, यह कटाई पूरी तरह से स्वीकृत गाइडलाइन और वैज्ञानिक कार्ययोजना के तहत की जा रही है.

​शासन की नीति के अनुसार, इस कटाई से प्राप्त लकड़ी की नीलामी और बिक्री से मिलने वाली रॉयल्टी का 20 प्रतिशत हिस्सा संबंधित वन समितियों को दिया जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक मजबूती आने का दावा किया जा रहा है.

क्यों जरूरी है कटाई ? विभाग का तर्क

​विभाग का कहना है कि 31 वर्षों से प्रबंधन न होने के कारण जंगलों में पेड़ों की संख्या जरूरत से ज्यादा होने के कारण सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुँच पा रही थी. पुराने और बीमार पेड़ों की संख्या बढ़ने से वनों के प्राकृतिक पुनर्जननमें बाधा आ रही थी. कूप कटाई से वन सुधार होगा और नई पौध के विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनेगा.

1994 की आगजनी और तीन दशक का सन्नाटा

​बीजापुर में कूप कटाई का इतिहास सुरक्षा चुनौतियों से भरा रहा है. आखिरी बार 1993 में कटाई हुई थी, लेकिन 1994 में नक्सलियों द्वारा बड़ी आगजनी की घटना को अंजाम देने के बाद सुरक्षा कारणों से इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया था. अब तीन दशक बाद, बदली हुई सुरक्षा परिस्थितियों और नई नीतियों के बीच विभाग ने फिर से मोर्चा संभाला है.

ग्रामीणों का आक्रोश : पेसा एक्ट और पाँचवी अनुसूची का हवाला

​एक तरफ विभाग इसे ‘विकास’ बता रहा है, तो दूसरी तरफ ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है. ग्रामीणों का कहना है कि संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के तहत वनों पर ग्राम सभा का मालिकाना हक है. ग्रामीणों का आरोप है कि कटाई के लिए ली गई सहमति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. जंगलों पर निर्भर आदिवासियों को डर है कि इस व्यावसायिक कटाई से उनकी पारंपरिक आजीविका और जल-जंगल-जमीन का संतुलन बिगड़ जाएगा. ​ग्रामीणों की मांग है कि बिना ग्राम सभा की स्पष्ट और लिखित सहमति के एक भी पेड़ न काटा जाए.

वन सुधार बनाम आदिवासी अधिकार

​बीजापुर का यह घटनाक्रम अब केवल पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह “वैज्ञानिक वन प्रबंधन बनाम आदिवासी स्वशासन” की एक बड़ी वैचारिक जंग बन गया है. शासन का दावा है कि यह प्रक्रिया रोजगार और संरक्षण के बीच संतुलन बनाएगी, जबकि आदिवासियों के लिए यह उनके अस्तित्व की लड़ाई है.

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