मर्दापाल : माओवाद की छाया से निकलकर बना हॉकी का नया गढ़ – बस्तर ओलंपिक में दांव पर है प्रथम स्थान !
जगदलपुर (डेस्क) – कभी भय और असुरक्षा का पर्याय रहा कोंडागांव जिले का मर्दापाल क्षेत्र आज सशक्तिकरण और खेल गौरव की कहानी कह रहा है. वनांचल और सुदूरवर्ती गाँवों से आने वाली इन बेटियों ने हॉकी को सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि हिम्मत, अनुशासन और सपनों को साधने का जरिया बना लिया है. बस्तर ओलम्पिक के बड़े मंच पर एक बार फिर, मर्दापाल क्षेत्र की ये जाँबाज खिलाड़ी अपनी प्रतिभा का जौहर दिखाने को तैयार हैं.
मर्दापाल की बेटियां, बस्तर का गौरव
शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला मर्दापाल और प्री-मैट्रिक कन्या छात्रावास में रहकर पढ़ाई करने वाली ये छात्राएँ गरीबी और पिछड़ेपन की दीवारों को तोड़कर मैदान में उतर रही हैं.
● सुलंती कोर्राम (कक्षा 12वीं, बोरगांव): टीम की सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं, जो चार बार राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुकी हैं और झारखंड में नेशनल हॉकी प्रतियोगिता में भी अपने खेल कौशल का प्रदर्शन कर चुकी हैं.
● प्रिया नेताम (कक्षा 12वीं, कबेंगा): कई बार स्टेट स्तर पर खेल चुकी हैं और भारतीय महिला हॉकी टीम का हिस्सा बनने का सपना देखती हैं.
● संगीता कश्यप (कक्षा 8वीं, कुदुर): पिछले तीन वर्षों से हॉकी खेल रही हैं और मानती हैं कि हॉकी ने उन्हें हिम्मत और लक्ष्य के प्रति समर्पण सिखाया है.
● रमली कश्यप (कक्षा 7वीं, कुधुर): पांचवीं कक्षा से हॉकी खेल रही हैं और अपने सीनियर को देखकर प्रेरित हुई थीं.
अन्य उभरती प्रतिभाएँ: कांति बघेल, दीपा कश्यप (कुधुर), सुनीता नेताम (दिगानार), राजन्ती कश्यप और खेमेश्वरी सोढ़ी जैसी खिलाड़ी भी निरंतर अभ्यास से टीम को मजबूती दे रही हैं. सुनीता नेताम पहले भी राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में खेल चुकी हैं.
सुलंती कोर्राम (सीनियर खिलाड़ी) का हौसला: “खेल ने मुझे आगे बढ़ने का हौसला दिया है. मैं चाहती हूँ कि हमारे गाँव की और भी लड़कियाँ खेल के माध्यम से खुद को आगे लाएँ.”
इस बार लक्ष्य सिर्फ ‘प्रथम स्थान’
यह टीम पिछले वर्ष जिला स्तरीय बस्तर ओलम्पिक में प्रथम और संभाग स्तरीय प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान हासिल कर चुकी है. आने वाले दिनों में संभाग स्तरीय बस्तर ओलम्पिक में हिस्सा लेने जा रही टीम ने इस बार कड़ा संकल्प लिया है।
टीम का सामूहिक संकल्प: “इस बार हम प्रथम स्थान के साथ जिले का नाम रोशन करेंगे.”
बच्चों की इस तैयारी को देखकर उनके माता-पिता बेहद उत्साहित हैं. आज ये बेटियाँ हॉकी स्टिक थामकर जिला और राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं, जो एक बड़ा सामाजिक बदलाव है.
बस्तर ओलम्पिक : क्रांति का सुनहरा मंच
बस्तर ओलम्पिक सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं है. माओवाद को ख़त्म कर अंतिम व्यक्ति तक शासन की नीतियों को पहुँचाने की पहल का यह सबसे बड़ा परिणाम है. जिन मर्दापाल, कुदुर, और दिगानार जैसे गाँवों का नाम कभी हिंसा से जोड़ा जाता था, आज वहाँ खेल, शिक्षा और विकास नई पहचान बन रहे हैं.
शासन-प्रशासन के प्रयासों से स्कूलों में खेल सामग्री, प्रशिक्षकों की नियुक्ति और छात्रावास की सुविधाओं ने इन बेटियों को अपने सपनों को साकार करने का अवसर दिया है. कोंडागांव की ये बेटियाँ न सिर्फ अपने परिवार का गौरव बढ़ा रही हैं, बल्कि पूरे बस्तर क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन रही हैं.
यह कहानी सिर्फ खेल की नहीं है… यह ‘बदलते बस्तर’ की विजय गाथा है, जहाँ बेटियाँ अब हाकी स्टिक थामकर अपने लक्ष्य को साध रही हैं.