जगदलपुर (डेस्क) – विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व ने आज शुक्रवार को अपनी सबसे अनूठी और सामाजिक समरसता से भरी रस्म ‘बाहर रैनी’ पूरी की. इस दौरान, राज परिवार के सदस्य ने सदियों पुरानी परंपरा निभाते हुए, माड़िया आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ मिलकर ‘नवाखानी’ (नए चावल की खीर) खाई. यह भावुक क्षण राज और आदिवासी समुदाय के बीच गहरे पारंपरिक सद्भाव का प्रतीक बना.

परंपरा : रूठे हुए ग्रामीणों का मान-मनौव्वल

​दरअसल, विजयादशमी की रात को ‘भीतर रैनी’ रस्म के तहत, माड़िया समुदाय के ग्रामीणों ने प्रतीकात्मक रूप से आठ पहियों वाला विशाल विजय रथ चुरा लिया और इसे नगर के समीप कुम्हड़ाकोट जंगल में छिपा दिया. यह रस्म उस ऐतिहासिक घटना को याद करती है जब एक बार ग्रामीणों ने राजा से असंतुष्ट होकर रथ चुरा लिया था.

शुक्रवार को, रथ को वापस लाने के लिए राज परिवार के सदस्य, राजगुरू और मांझी-मुखिया पूरे गाजे-बाजे के साथ जंगल पहुँचे. यहाँ राजा ने सदियों पुरानी मर्यादा का पालन करते हुए विनम्रतापूर्वक ग्रामीणों से रथ लौटाने के लिए मान-मनौव्वल किया.

सद्भाव की शर्त : ‘नवाखानी’

​रथ लौटाने के बदले माड़िया समुदाय ने एक मर्मस्पर्शी शर्त रखी, राजा उनके साथ ‘नवाखानी’ खाएँगे. राज परिवार ने सहर्ष इस शर्त को स्वीकार किया. इसके बाद, नए चावल से बने इस पवित्र प्रसाद को राजा और आदिवासी समुदाय के सभी लोगों ने एक साथ ग्रहण किया. यह परंपरा बस्तर की अद्वितीय सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती है, जहाँ जनता (आदिवासी) और सत्ता (राज परिवार) के बीच सौहार्द को सबसे ऊपर रखा जाता है.

रथ वापसी और समापन

​नवाखानी की रस्म पूरी होने के बाद, माँ दंतेश्वरी का छत्र विधि-विधान के साथ रथ पर विराजित किया गया. माड़िया समुदाय के लोगों ने भारी उत्साह के साथ विजय रथ को जंगल से वापस खींचकर दंतेश्वरी मंदिर के सिंहद्वार तक पहुँचाया.

​’बाहर रैनी’ रस्म के समापन के साथ ही बस्तर दशहरा की रथ परिक्रमा पूरी हो गई. 75 दिनों तक चलने वाला यह अनोखा पर्व अब आगामी रस्मों ‘काछन जात्रा’ और ‘कुटुम्ब जात्रा’ के साथ अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है. इस अवसर पर सांसद महेश कश्यप और महापौर संजय पांडे सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे.

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