सुकमा (डेस्क) – चार दशकों तक माओवादी संगठन से जुड़ी रहने वाली वरिष्ठ माओवादी नेता काकराला सुनीता उर्फ बद्री उर्फ लक्ष्मी उर्फ गुरुस्मृति उर्फ सरोज और तेलंगाना राज्य समिति के क्षेत्रीय समिति सदस्य (एसीएम) चेन्नुरी हरीश उर्फ रमन्ना ने आज राचकोंडा पुलिस आयुक्त के समक्ष आत्मसमर्पण कर सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया है.
तेलंगाना सरकार और पुलिस की दीर्घकालिक पुनर्वास नीति और कल्याणकारी योजनाओं के प्रभाव से प्रभावित होकर, दोनों नेताओं ने हथियार छोड़कर शांति और समाज की ओर कदम बढ़ाया है. यह आत्मसमर्पण न सिर्फ उनके व्यक्तिगत जीवन में नया अध्याय है बल्कि माओवादी आंदोलन के लगातार कमजोर होते किले का भी बड़ा संकेत माना जा रहा है.
सुनीता की चार दशक लंबी यात्रा

62 वर्षीय काकराला सुनीता एक समय माओवादी आंदोलन की विचारधारा की प्रमुख स्तंभ मानी जाती थीं. विजयवाड़ा में छात्र जीवन से ही उसने माओवाद का रास्ता चुना. उसके पिता काकराला सत्यनारायण भी क्रांतिकारी लेखक संघ (विरसम) से जुड़े रहे, जिसके कारण उनका झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर हुआ. वर्ष 1986 में भूमिगत होने के बाद सुनीता ने नल्लमाला और एओबी क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई. बाद में अपने पति टीएलएन चालम के साथ दंडकारण्य (डीके) भेजी गईं, जहां उसने वैचारिक प्रशिक्षण, शिक्षा और पार्टी पत्रिकाओं के प्रकाशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
पार्टी की वैचारिक रीढ़ कहे जाने वाली सुनीता ने असंख्य युवाओं और कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया. लेकिन जून 2025 की अन्नापुरम मुठभेड़ में पति की मौत के बाद उसका मन आंदोलन से डगमगाने लगा. अंततः उसने शांति और सामाजिक जीवन की राह पकड़ने का साहसिक निर्णय लिया.
रमन्ना की अधूरी दास्तान

35 वर्षीय चेन्नुरी हरीश उर्फ रमन्ना छात्र जीवन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों से प्रभावित होकर माओवादी आंदोलन से जुड़ गया. आर्थिक तंगी और व्यक्तिगत संघर्षों के बीच उसका रास्ता कई बार टूटा और जुड़ा. वर्ष 2020 के बाद से वह अलग – अलग दलों के साथ काम करता रहा और वर्ष 2024 में उसे क्षेत्र समिति सदस्य के पद पर पदोन्नति मिली. कई मुठभेड़ों में शामिल रहने के बावजूद, माओवाद संगठन में लगातार हताहत और भविष्य की अनिश्चितता ने उसे भी मुख्यधारा की ओर लौटने को प्रेरित किया.
पुलिस और सरकार की रणनीति का असर
राचकोंडा पुलिस ने इस मौके पर कहा कि सरकार की पुनर्वास योजना के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को सभी लाभ दिए जाएंगे. पुलिस ने शेष भूमिगत माओवादियों से भी अपील की कि वे अपने गांव लौटकर शांतिपूर्ण जीवन जिएं और राज्य के विकास में योगदान दें.
माओवाद का बदलता चेहरा
तेलंगाना और देशभर में अब माओवादी विचारधारा तेजी से कमजोर पड़ रही है. युवाओं का रुझान शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास की ओर है. माओवादी भर्ती लगभग थम चुकी है और लोग हिंसा की विचारधारा को ठुकरा रहे हैं.
आज सुनीता और हरीश उर्फ रमन्ना का आत्मसमर्पण इस संदेश को और मजबूत करता है कि हिंसा से कुछ हासिल नहीं होता. हथियार छोड़कर जब लोग समाज और परिवार की ओर लौटते हैं, तभी असली क्रांति और विकास का रास्ता खुलता है.
“हथियार छोड़ो, गांव लौटो और विकास में शामिल हो जाओ”—तेलंगाना पुलिस की अपील आज एक मार्मिक सच्चाई बन गई है.