सुकमा (डेस्क) – कभी नक्सली दहशत के साए में जीने को मजबूर लखापाल गांव आज आज़ादी और बदलाव की मिसाल बनकर सामने आया है. दो दशक पहले माओवादी फरमान के बाद यहां का भगवान राम मंदिर बंद कर दिया गया था. पूजा – अर्चना रुक गई, मंदिर के दरवाज़े सूने हो गए और गांव पर भय का साया गहरा गया. लेकिन हालात तब बदले, जब सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन की तैनाती इस इलाके में हुई.

सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने न सिर्फ गांववालों के मन से डर निकाला, बल्कि विकास और विश्वास का माहौल भी तैयार किया. गांव में पहुंचने के लिए सड़क, बिजली कनेक्शन और पानी की व्यवस्था सुधरने लगी. सबसे अहम बदलाव तब आया, जब ग्रामीणों ने मिलकर 20 साल बाद भगवान राम मंदिर के कपाट खोलने का निर्णय लिया. घंटों की आवाज़ और आरती की गूंज ने मानो गांव में नई जान फूंक दी.

देश के 79 वें स्वतंत्रता दिवस पर लखापाल ने इतिहास रच दिया. पूरा गांव तिरंगे के रंग में रंगा, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने बड़े हर्षोल्लास से राष्ट्रीय ध्वज फहराया. जहां कभी नक्सली दहशत के कारण पंचायत चुनाव तक कराना मुश्किल था, वहां आज तिरंगा लहराते समय किसी को डर नहीं था.

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लोग शाम ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे. त्योहार, मेले और धार्मिक कार्यक्रम सब खत्म हो गए थे. लेकिन अब माहौल बदल गया है. बच्चे स्कूल जा रहे हैं, महिलाएं आत्मनिर्भर हो कर काम कर रही हैं और युवा खेलकूद में हिस्सा ले रहे हैं.

लखापाल की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस विश्वास की मिसाल है जो सुरक्षा, विकास और लोगों की एकजुटता से जन्म लेता है. जहां कभी बंदूक की धमक थी, वहां अब शंख और मृदंग की धुन सुनाई दे रही है. गांववालों का कहना है — “हमारे लिए यह सिर्फ मंदिर का खुलना नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की आज़ादी है.”

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